केंद्र सरकार के सहकारिता मंत्रालय ने PACS के लिए एक "मॉडल बाय-लॉज़" तैयार किया है, जिसका मक़सद PACS को सिर्फ़ कृषि ऋण देने वाली संस्था से आगे बढ़ाकर एक बहुउद्देश्यीय (multi-purpose) संस्था बनाना है। सहकारिता मंत्रालय के मुताबिक PACS तब ज़्यादा सशक्त और आर्थिक रूप से टिकाऊ होंगी, जब वे बहुउद्देश्यीय बनेंगी। यह गाइड इन मॉडल बाय-लॉज़ को — क्या हैं, कौन-सी नई गतिविधियाँ, गवर्नेंस व सदस्य-अधिकार में बदलाव, अपनाने की क़ानूनी प्रक्रिया, हरियाणा में असर व सावधानियाँ — स्रोत-सहित विस्तार से समझाती है।
📌 शुरुआती नोट: मॉडल बाय-लॉज़ एक टेम्पलेट/सुझाव है, कोई अपने-आप लागू होने वाला कानून नहीं। किसी एक PACS पर यह तभी लागू होता है जब वह इसे अपनी आम सभा में विधिवत अपना ले (नीचे प्रक्रिया देखें)। आँकड़े व सूची समय के साथ बदल सकते हैं — नवीनतम जानकारी के लिए स्रोत खंड के आधिकारिक दस्तावेज़ व अपने रजिस्ट्रार कार्यालय से पुष्टि करें।
दशकों तक अधिकांश PACS सिर्फ़ अल्पकालिक कृषि ऋण तक सीमित रहीं। इससे दो समस्याएँ पैदा हुईं — एक, कई PACS आर्थिक रूप से कमज़ोर व घाटे में रहीं, क्योंकि आय का एक ही स्रोत था; और दो, गाँव की ज़रूरतें (भंडारण, इनपुट, सेवाएँ) पूरी करने के लिए किसान को अलग-अलग जगह जाना पड़ता था। मॉडल बाय-लॉज़ इसी का समाधान है — PACS को एक ही छत के नीचे कई सेवाएँ देने वाली, विविध-आय वाली, टिकाऊ संस्था बनाना। यह "सहकार से समृद्धि" की व्यापक सोच का हिस्सा है, जहाँ मज़बूत PACS को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी माना गया है। सोच यह है कि जब एक ही गाँव-स्तरीय संस्था कई ज़रूरतें पूरी करे, तो किसान का भरोसा भी बढ़ता है और समिति की आय भी — और यही आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की नींव बनता है।
मॉडल बाय-लॉज़ के तहत PACS को 25 से अधिक व्यावसायिक गतिविधियों में काम करने की अनुमति दी गई है, जिनमें प्रमुख हैं:
यानी एक PACS अब खाद-बीज से आगे बढ़कर दूध, मछली, भंडारण, ईंधन, दवा, बैंकिंग व डिजिटल सेवाओं तक — एक "बहुउद्देश्यीय ग्रामीण सेवा-केंद्र" बन सकती है। हर PACS ज़रूरत व स्थानीय माँग के अनुसार इनमें से गतिविधियाँ चुन सकती है; सब एक साथ करना ज़रूरी नहीं।
💡 CSC सेवाएँ (आधार, बिल, बीमा आदि) इसी बहुउद्देश्यीय दिशा का एक हिस्सा हैं — विस्तार से: PACS अब CSC भी।
मॉडल बाय-लॉज़ सिर्फ़ नई गतिविधियों तक सीमित नहीं — इनका दूसरा बड़ा उद्देश्य बेहतर गवर्नेंस, पारदर्शिता व समावेशी सदस्यता है। इनमें ऐसे प्रावधान हैं जो सदस्यता को अधिक व्यापक व समावेशी बनाते हैं — ख़ासकर महिलाओं व अनुसूचित जाति/जनजाति को प्रबंधन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने पर ज़ोर। मक़सद यह है कि PACS सिर्फ़ कुछ प्रभावशाली लोगों की नहीं, बल्कि पूरे गाँव-समुदाय की संस्था बने। यह सहकारिता के "लोकतांत्रिक नियंत्रण" व "समानता" मूल्यों को ज़मीन पर उतारने का प्रयास है।
सहकारिता मंत्रालय के मुताबिक अब तक 32 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने या तो मॉडल बाय-लॉज़ को अपना लिया है, या उनके मौजूदा बाय-लॉज़ पहले से ही मॉडल बाय-लॉज़ के अनुरूप हैं। यह दिखाता है कि यह कोई अकेली, स्थानीय पहल नहीं — बल्कि पूरे देश में PACS को बहुउद्देश्यीय बनाने का एक समन्वित अभियान है, जो 2 लाख नई बहुउद्देश्यीय PACS बनाने की व्यापक योजना से भी जुड़ा है।
हरियाणा में इस बहुउद्देश्यीय बदलाव का एक ठोस उदाहरण पहले से मौजूद है — राज्य की (रिपोर्ट के अनुसार) लगभग 742 PACS प्रधानमंत्री किसान समृद्धि केंद्र (PM-KSK) के रूप में काम कर रही थीं, यानी वे उर्वरक और कृषि इनपुट वितरण जैसी अतिरिक्त सेवाएं दे रही थीं — यह ठीक वही दिशा है जो मॉडल बाय-लॉज़ प्रस्तावित करते हैं।
⚠️ ताज़ा संख्या समय के साथ बदलती है — किसी वर्तमान आँकड़े के लिए हरियाणा सहकारिता विभाग/संबंधित ARCS कार्यालय से पुष्टि करें। यहाँ उद्देश्य यह दिखाना है कि हरियाणा में बहुउद्देश्यीय PACS की दिशा पहले से गति पकड़ चुकी है।
PM-KSK का उदाहरण इसलिए अहम है क्योंकि यह "काग़ज़ी प्रावधान" नहीं, बल्कि ज़मीन पर चल रही गतिविधि है — यह दिखाता है कि PACS कृषि ऋण से आगे बढ़कर वास्तव में इनपुट-वितरण जैसी सेवाओं से अतिरिक्त आय व सदस्य-सेवा दोनों कर सकती हैं। किसान को खाद, बीज व कृषि-इनपुट अपने ही गाँव की भरोसेमंद समिति से मिल जाते हैं, और समिति को कमीशन/मार्जिन से आय — यह "सबका फ़ायदा" वाला मॉडल है, जो मॉडल बाय-लॉज़ की मूल भावना है।
⚠️ मॉडल बाय-लॉज़ ख़ुद कोई कानून नहीं — यह एक टेम्पलेट/सुझाव है, जिसे हर PACS को अधिनियम की धारा 9A व 10 के तहत निर्धारित प्रक्रिया से (2/3 बहुमत, आम सभा में) अपने बाय-लॉज़ में औपचारिक रूप से अपनाना होता है। सिर्फ़ राज्य सरकार का मॉडल अपनाना ही किसी एक PACS को अपने-आप नई गतिविधियां शुरू करने का अधिकार नहीं देता।
यह भेद बहुत ज़रूरी है, और अक्सर यहीं भ्रम होता है। "राज्य ने मॉडल अपना लिया" एक नीतिगत कदम है; पर आपकी PACS तब तक नई गतिविधि नहीं कर सकती जब तक वह ख़ुद अपनी आम सभा में उपविधि-संशोधन पारित न कर ले। यानी दो अलग स्तर हैं — राज्य-स्तरीय अपनाव, और समिति-स्तरीय औपचारिक संशोधन। दूसरे के बिना पहला किसी एक PACS को कोई नया अधिकार नहीं देता।
एक PACS मॉडल बाय-लॉज़ (या उसकी नई गतिविधियाँ) इस तरह अपनाती है:
🔑 याद रखें — सिर्फ़ आम सभा में पास कर देना काफ़ी नहीं; उपविधि-संशोधन रजिस्ट्रार के पास रजिस्टर होने के बाद ही लागू माना जाता है। (उपविधि की बुनियाद: उपविधि क्या हैं।)
उपविधि-संशोधन के अलावा, कोई नई गतिविधि (जैसे पेट्रोल पंप, गोदाम, डेयरी) शुरू करने से पहले PACS को व्यावहारिक तैयारी भी करनी होती है:
इसलिए मॉडल बाय-लॉज़ अपनाना पहला कदम है, अंतिम नहीं — असली सफलता सोच-समझकर, चरणबद्ध तरीके से नई गतिविधियाँ चुनने व चलाने में है।
बहुउद्देश्यीय बनने का मतलब है कई तरह की आय व खर्च — और इन्हें अलग-अलग दिखाना ज़रूरी है, वरना पता ही नहीं चलेगा कि कौन-सी गतिविधि फ़ायदे में है और कौन घाटे में। इसलिए हर गतिविधि (डेयरी, ईंधन, भंडारण आदि) की आय व खर्च का अलग खाता/हेड रखें, और साल-अंत पर श्रेणीवार लाभ-हानि देखें। यही अनुशासन बहुउद्देश्यीय PACS को सचमुच लाभदायक बनाता है — क्योंकि तब प्रबंध समिति डेटा के आधार पर तय कर सकती है कि किस गतिविधि को बढ़ाना है, किसे समेटना।
क्या मॉडल बाय-लॉज़ अपनाना अनिवार्य है? — राज्य स्तर पर अपनाना एक नीतिगत कदम है, पर किसी एक PACS को इसका लाभ लेने के लिए अपनी आम सभा में औपचारिक रूप से बाय-लॉज़ संशोधन पारित करना होता है। क्या मॉडल बाय-लॉज़ अपनाते ही PACS नई गतिविधि शुरू कर सकती है? — नहीं। धारा 9A/10 के तहत निर्धारित प्रक्रिया (2/3 बहुमत, आम सभा में प्रस्ताव) व रजिस्ट्रेशन पूरा करना होता है, इसके बाद ही नई गतिविधि क़ानूनी रूप से शुरू हो सकती है। PM-KSK और मॉडल बाय-लॉज़ का क्या संबंध है? — PM-KSK (उर्वरक/इनपुट वितरण केंद्र) मॉडल बाय-लॉज़ के बहुउद्देश्यीय दृष्टिकोण का एक ज़मीनी उदाहरण है — यह दिखाता है कि PACS कृषि ऋण से आगे बढ़कर कैसे काम कर सकती हैं। कितनी नई गतिविधियाँ अनुमत हैं? — 25 से अधिक — डेयरी, मत्स्य, गोदाम, कस्टम हायरिंग, ईंधन/LPG, जन औषधि, FPS, BC, CSC आदि। क्या हर PACS को सभी गतिविधियाँ करनी होंगी? — नहीं; ये विकल्प हैं, PACS अपनी ज़रूरत व व्यवहार्यता अनुसार चुनती है। कितने राज्यों ने अपनाया है? — सहकारिता मंत्रालय के अनुसार 32 राज्य/केंद्रशासित प्रदेश (अपनाया या पहले से अनुरूप)। गवर्नेंस में क्या बदला? — अधिक समावेशी सदस्यता, महिला व SC/ST प्रतिनिधित्व पर ज़ोर, और बेहतर पारदर्शिता। नई गतिविधि का हिसाब कैसे रखें? — हर गतिविधि की आय-खर्च का अलग हेड, ताकि श्रेणीवार लाभ-हानि साफ़ दिखे। नई गतिविधि के लिए और क्या चाहिए? — उपविधि-संशोधन के अलावा ज़रूरी लाइसेंस, पूँजी, प्रशिक्षित स्टाफ़ व स्थानीय माँग का आकलन।
मॉडल बाय-लॉज़ PACS के लिए एक बड़ा अवसर हैं — कृषि ऋण की एकल-आय वाली संस्था से बहुउद्देश्यीय, विविध-आय वाले ग्रामीण सेवा-केंद्र में बदलने का। पर यह अवसर तभी फलता है जब PACS दो बातें ठीक से करे: पहला, विधिवत उपविधि-संशोधन (आम सभा 2/3 बहुमत + रजिस्ट्रेशन), और दूसरा, हर नई गतिविधि की सोच-समझकर तैयारी व अलग हिसाब। सिर्फ़ राज्य का मॉडल अपनाना काफ़ी नहीं — असली बदलाव समिति-स्तर पर, नियम-सम्मत व चरणबद्ध ढंग से आता है। जो PACS यह करती है, वह अपनी व्यवहार्यता भी मज़बूत करती है और गाँव की सेवा भी।
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📘 यह लेख उपरोक्त आधिकारिक स्रोतों + सक्रिय Knowledge Items से बना — Evidence Level A/B। नोट: अनुमत गतिविधियों की सूची, राज्यों की संख्या, PM-KSK आँकड़ा व अपनाने की सटीक प्रक्रिया समय के साथ/राज्यवार बदलती है — कोई भी वर्तमान आँकड़ा/प्रावधान सहकारिता मंत्रालय, अपने राज्य के अधिनियम व रजिस्ट्रार कार्यालय से पुष्टि करें।
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