हरियाणा में हर सहकारी समिति — चाहे PACS हो, CM-PACS हो, दुग्ध समिति हो या हार्को बैंक जैसी बड़ी संस्था — क़ानूनी तौर पर एक ही मूल क़ानून से संचालित होती है: हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम, 1984 (Haryana Act No. 22 of 1984)। पंजीकरण से लेकर चुनाव, ऑडिट, विवाद और समापन तक — हर प्रक्रिया इसी अधिनियम के किसी न किसी अध्याय से तय होती है। पर अकेले अधिनियम पढ़ना काफ़ी नहीं — उसे लागू करने का व्यावहारिक ढाँचा हरियाणा सहकारी समिति नियम, 1989 से मिलता है। यह गाइड दोनों दस्तावेज़ों की पूरी संरचना आसान हिन्दी में समझाती है।

⚠️ यह एक सामान्य जानकारी वाला गाइड है, क़ानूनी सलाह नहीं। किसी विशिष्ट मामले में हमेशा मूल बेयर एक्ट/नियम, हरियाणा सहकारिता विभाग या किसी योग्य वक़ील से पुष्टि करें।

अधिनियम और नियमों में फ़र्क़

सरल भाषा में — अधिनियम (Act) "क्या करना है" तय करता है (जैसे: हर समिति का ऑडिट होना चाहिए), जबकि नियम (Rules) "कैसे करना है" बताते हैं (जैसे: ऑडिट किस फ़ॉर्म पर होगा, कितनी फ़ीस लगेगी, कितने महीने में बैलेंस शीट तैयार करनी है)। 1984 के अधिनियम के 5 साल बाद बने ये नियम अधिनियम के हर अध्याय के लिए व्यावहारिक प्रक्रिया देते हैं — इसीलिए दोनों को साथ पढ़ना ज़रूरी है।

अधिनियम 1984 — 15 अध्याय, सवा सौ से ज़्यादा धाराएँ

अधिनियम समिति के "जन्म से मृत्यु तक" — यानी पंजीकरण से लेकर विघटन तक — हर चरण को कवर करता है:

अध्याय विषय (धारा)
I प्रारंभिक — नाम, विस्तार, परिभाषाएँ (धारा 1-2)
II पंजीकरण, बाय-लॉज़ संशोधन, समामेलन, बीमार समितियों का विघटन (धारा 3-15)
III सदस्यों के अधिकार व दायित्व (धारा 16-24)
IV प्रबंधन — आम सभा, चुनाव, रजिस्ट्रार की शक्तियाँ (धारा 25-36A)
V कॉमन कैडर — साझा कर्मचारी व्यवस्था (धारा 37-38)
VI विशेषाधिकार — निगमित निकाय का दर्जा, स्टाम्प शुल्क छूट (धारा 39-46)
VII लेखा व रिकॉर्ड (धारा 47-51)
VIII प्रभार व बंधक — फ़सल पर पहला हक़, भूमि बंधक (धारा 52-62)
IX ऋण व उधार — सीमा, कमजोर वर्ग आरक्षण (धारा 63-71)
X कुर्की व नीलामी — बक़ाया वसूली (धारा 72-80)
XI ऑडिट — नियुक्ति, रजिस्ट्रार-ऑडिट, आपत्ति निपटारा (धारा 81-95)
XII विवाद व मध्यस्थता (धारा 96-102)
XIII समापन (धारा 103-110)
XIV निरीक्षण — रजिस्ट्रार की जांच शक्तियाँ (धारा 111-116)
XV अपराध व दंड (धारा 117-125)

पंजीकरण के मुख्य प्रावधान (अध्याय II)

नई सहकारी समिति बनाने के लिए न्यूनतम 10 व्यस्क सदस्य चाहिए (सरकारी रोज़गार योजनाओं में यह सीमा 5 तक भी हो सकती है)। रजिस्ट्रार अगर पंजीकरण अस्वीकार करता है, तो एक महीने के भीतर कारण सहित सूचित करना अनिवार्य है (धारा 8)। बाय-लॉज़ संशोधन 2/3 बहुमत और 15 दिन के नोटिस के बाद मान्य होता है, और रजिस्ट्रार को 3 महीने के भीतर उसका पंजीकरण करना होता है (धारा 10)। अगर लगातार तीन साल तक किसी समिति का घाटा उसकी नेटवर्थ से ज़्यादा हो जाए, तो उसे "बीमार समिति" मानकर विघटित किया जा सकता है (धारा 14-A)।

सदस्यों के अधिकार (अध्याय III)

हर सदस्य को समिति के मामलों में सिर्फ़ एक वोट का अधिकार है (धारा 20), चाहे शेयर कितने भी हों — "एक सदस्य, एक वोट" के सहकारी सिद्धांत को यह कानूनी आधार देता है। वोटिंग व्यक्तिगत रूप से ही होती है, प्रॉक्सी की अनुमति नहीं (धारा 21)। शेयर ट्रांसफर पर 2 साल की न्यूनतम होल्डिंग शर्त है (धारा 22), और सदस्य की मृत्यु के बाद भी उसका दायित्व अगले 2 साल तक बना रह सकता है, अगर उस तारीख़ तक कोई बक़ाया मौजूद हो (धारा 24)।

प्रबंधन, चुनाव व रजिस्ट्रार की शक्तियाँ (अध्याय IV)

यह अध्याय व्यवहार में सबसे ज़्यादा विवादों का केंद्र रहता है। समिति का सर्वोच्च अधिकार आम सभा में निहित होता है (धारा 25)। अगर कमेटी अपनी शक्तियों से बाहर जाकर कोई प्रस्ताव पास करे, तो रजिस्ट्रार उसे अधिकतम 6 महीने के लिए निलंबित कर सकते हैं (धारा 27)। कमेटी के चुनाव में अनुसूचित जाति व महिला सदस्य का प्रतिनिधित्व अनिवार्य है, और निवर्तमान सदस्यों पर कुछ स्थितियों में 5 साल का चुनाव प्रतिबंध लग सकता है (धारा 28)। अगर सरकार ने शेयर पूँजी दी हो या ऋण की गारंटी ली हो, तो वह कमेटी में अधिकतम 3 सदस्य या निर्वाचित सदस्यों का 1/3 (जो भी कम हो) नामित कर सकती है (धारा 29)। कमेटी न होने पर रजिस्ट्रार प्रशासक नियुक्त कर सकते हैं (अधिकतम 6 महीने, सरकार की अनुमति से 2 साल तक), और लापरवाह/हितविरोधी कमेटी को पूरी तरह हटाया भी जा सकता है (धारा 33-35)।

ऑडिट, विवाद व समापन (अध्याय XI, XII, XIII)

हर समिति को अपने बाय-लॉज़ के अनुसार ऑडिटर नियुक्त करना होता है (धारा 81), पर रजिस्ट्रार ख़ुद भी ऑडिट निर्देशित कर सकते हैं और समिति के विफल रहने पर ख़ुद ऑडिटर नियुक्त कर सकते हैं (धारा 82, 84)। विवाद सीधे सिविल कोर्ट नहीं, बल्कि रजिस्ट्रार या मध्यस्थ के पास भेजे जाते हैं (धारा 96), और मध्यस्थ का फ़ैसला बाध्यकारी होता है (देखें: समिति में विवाद कहाँ जाएँ)। समापन (winding up) 2/3 प्रस्ताव, एक साल की निष्क्रियता, दिवालियापन या लगातार उल्लंघन जैसी स्थितियों में रजिस्ट्रार के आदेश से होता है (धारा 103), जिसके बाद लिक्विडेटर नियुक्त होता है। अपराध-दंड के तहत जुर्माना ₹500 से ₹5,000 तक हो सकता है (धारा 117-120), और रजिस्ट्रार कुछ मामलों में इसे 50% तक "कंपाउंड" भी कर सकते हैं (धारा 122)।

नियम 1989 — 16 अध्याय, व्यावहारिक प्रक्रिया

अध्याय विषय (नियम)
I प्रारंभिक — परिभाषाएँ (नियम 1-2)
II पंजीकरण व बाय-लॉज़ — न्यूनतम 5 परिवार, संशोधन में 2/3 बहुमत (नियम 3-13)
III सदस्यता — पात्रता, सदस्य रजिस्टर (नियम 14-22)
IV आम सभा की बैठकें — चुनाव प्रक्रिया व अयोग्यताएँ (नियम 23-30)
V कैडर सोसाइटी (नियम 31)
VI विशेषाधिकार (नियम 32-35)
VII लेखा व रिकॉर्ड (नियम 36)
VIII प्रभार व बंधक (नियम 37)
IX ऋण व उधार — जमा सीमा, स्व-शेयर पर ऋण प्रतिबंध (नियम 38-42)
X उपज बिक्री प्रक्रिया — कुर्की, नीलामी (नियम 43-70)
XI संपत्ति व फंड — लाभांश सीमा, शिक्षा फंड (नियम 71-75)
XII कमज़ोर समितियों का पुनर्वास (नियम 76-76B)
XIII ऑडिट व लेखा — समयसीमाएँ (नियम 77-80)
XIV विवाद निपटान — प्रक्रिया व समयसीमा (नियम 81-88)
XV समापन — प्रक्रिया व रिपोर्टिंग (नियम 89-101)
XVI अवार्ड/डिक्री निष्पादन (नियम 102-104)

कुछ व्यावहारिक समयसीमाएँ जो याद रखनी चाहिए

प्रावधान समयसीमा
पंजीकरण के लिए न्यूनतम परिवार 5 (नियम 4)
बैलेंस शीट तैयार करना (वित्तीय वर्ष ख़त्म होने से) 3 महीने के भीतर (नियम 79)
मध्यस्थता अवार्ड 6 महीने के भीतर, विस्तार संभव (नियम 86)
लाभांश की अधिकतम सीमा 10% प्रति वर्ष (नियम 72)
शिक्षा फंड में योगदान मुनाफ़े का 2% तक (नियम 73)
रिकॉर्ड नष्ट करने की अनुमति समापन के 3 साल बाद (नियम 101)

एक ध्यान देने वाली बात यह है कि कमेटी चुनाव की विस्तृत प्रक्रिया — रिटर्निंग ऑफ़िसर की नियुक्ति, वोटर लिस्ट, नामांकन, मतदान — मुख्य नियमों के बजाय एक अलग "परिशिष्ट A (Appendix A)" में दी गई है, जिसका सीधा संदर्भ नियम 25 में मिलता है। अधिनियम की धारा 28 (चुनाव के मूल प्रावधान) को व्यवहार में लागू करने का पूरा ढाँचा यहीं से आता है।

💡 अक्सर सदस्य या समिति सचिव यह मान लेते हैं कि सिर्फ़ अधिनियम पढ़ लेना काफ़ी है, लेकिन असल विवाद (देर से ऑडिट, चुनाव प्रक्रिया पर सवाल, समय पर बैलेंस शीट न बनना) अक्सर नियमों में दी गई सटीक समयसीमा और फ़ॉर्म को न जानने से पैदा होते हैं।

इसे व्यवहार में कैसे इस्तेमाल करें

इतने अध्याय व धाराएँ देखकर घबराने की ज़रूरत नहीं — एक समिति-सचिव या सदस्य को पूरा अधिनियम रटना नहीं, बल्कि यह जानना है कि किस स्थिति में किस हिस्से को देखना है। जब सवाल पंजीकरण का हो → अध्याय II; सदस्यता/मतदान → अध्याय III; चुनाव/प्रबंधन → अध्याय IV; ऑडिट → अध्याय XI; विवाद → अध्याय XII। और हर बार, अधिनियम के साथ उसका संबंधित नियम भी देखें — क्योंकि सटीक फ़ॉर्म, फ़ीस व समयसीमा वहीं मिलती है। इस "स्थिति → अध्याय → नियम" वाली आदत से यह विशाल क़ानून एक व्यावहारिक संदर्भ-पुस्तक बन जाता है, डराने वाला दस्तावेज़ नहीं।

आम व्यावहारिक स्थितियाँ

रोज़मर्रा में जो सवाल सबसे ज़्यादा आते हैं, उनके लिए मोटा नक़्शा:

हर स्थिति में अंतिम शब्द मूल बेयर-एक्ट/नियम व सहकारिता विभाग का ही मानें — यह गाइड सिर्फ़ राह दिखाती है।

यह क्यों मायने रखता है

यह क़ानून 1984 का है, पर आज भी हरियाणा की हर PACS, CM-PACS, दुग्ध समिति और मार्केटिंग सोसाइटी इसी के तहत चलती है (देखें: CM-PACS क्या है)। जिन धाराओं का सबसे ज़्यादा व्यावहारिक असर पड़ता है — 27 (प्रस्ताव निलंबन), 28 (चुनाव) और 102 (सिविल कोर्ट की सीमित भूमिका) — उन पर हमने अलग विस्तृत लेख भी प्रकाशित किए हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अधिनियम और नियम में क्या फ़र्क़ है? — अधिनियम "क्या करना है" तय करता है, नियम "कैसे करना है" (फ़ॉर्म, फ़ीस, समयसीमा) बताते हैं। नई समिति बनाने के लिए कितने सदस्य चाहिए? — अधिनियम के तहत 10 व्यस्क सदस्य (सरकारी रोज़गार योजनाओं में 5 तक), नियमों के तहत न्यूनतम 5 परिवार। चुनाव की विस्तृत प्रक्रिया कहाँ मिलती है? — मुख्य नियमों में नहीं, बल्कि अलग "परिशिष्ट A" में, जिसका संदर्भ नियम 25 में है। कौन-सी धाराएँ सबसे ज़्यादा व्यावहारिक असर डालती हैं? — आमतौर पर धारा 27 (प्रस्ताव-निलंबन), 28 (चुनाव/प्रतिनिधित्व) व विवाद-निपटान (अध्याय XII) — रोज़मर्रा के अधिकांश विवाद इन्हीं के इर्द-गिर्द होते हैं। बैलेंस शीट कितने समय में तैयार करनी होती है? — वित्तीय वर्ष ख़त्म होने के 3 महीने के भीतर (नियम 79)। "एक सदस्य, एक वोट" का कानूनी आधार? — अध्याय III की धारा 20 — शेयर चाहे जितने हों, हर सदस्य को सिर्फ़ एक वोट; प्रॉक्सी की अनुमति नहीं (धारा 21)। विवाद कहाँ जाते हैं? — सीधे सिविल कोर्ट नहीं, बल्कि रजिस्ट्रार/मध्यस्थ के पास (अध्याय XII, धारा 96); मध्यस्थ का फ़ैसला बाध्यकारी। लाभांश की अधिकतम सीमा? — नियम 72 के अनुसार 10% प्रति वर्ष; शिक्षा फंड में मुनाफ़े का 2% तक (नियम 73)। बीमार समिति कब विघटित हो सकती है? — लगातार तीन साल घाटा नेटवर्थ से ज़्यादा होने पर (धारा 14-A)। इस विशाल क़ानून को कैसे इस्तेमाल करें? — पूरा रटें नहीं; "स्थिति → संबंधित अध्याय → उसका नियम" वाली आदत से इसे एक व्यावहारिक संदर्भ-पुस्तक की तरह इस्तेमाल करें। अंतिम पुष्टि कहाँ से? — किसी विशिष्ट मामले में मूल बेयर-एक्ट/नियम, हरियाणा सहकारिता विभाग या योग्य वक़ील से — यह गाइड सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं।

जुड़ी पढ़ाई: CM-PACS क्या है · समिति में विवाद कहाँ जाएँ · सहकारी कानून का ढाँचा

तीन बातें याद रखें

जुड़े शब्द: हरियाणा सहकारी अधिनियम 1984 · नियम 1989 · बाय-लॉज़ · रजिस्ट्रार · एक सदस्य एक वोट

📘 स्रोत: हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 (Act 22 of 1984) व नियम 1989 की संरचना (अध्याय व धारा/नियम संदर्भ)। यह सामान्य जानकारी है, कानूनी सलाह नहीं — किसी विशिष्ट मामले में मूल बेयर-एक्ट/नियम, सहकारिता विभाग या योग्य वक़ील से पुष्टि करें। Evidence Level B।

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