गांव में सहकारी समिति कहते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग़ में एक ही तस्वीर बनती है — खाद-बीज बाँटने वाली या किसानों को थोड़ा-बहुत कर्ज़ देने वाली PACS। हरियाणा सरकार ने 25 दिसंबर 2023 को पंचकूला में इस सोच से कहीं आगे का एक मॉडल लॉन्च किया — Comprehensive Multi-Purpose Activities Cooperative Society, यानी CM-PACS। रजिस्ट्रार, सहकारी समितियां, हरियाणा के मेमो PA/RCS/225-275 (25.12.2023) के ज़रिए इसके Model Bye-laws सभी ज़िलों में लागू करने के निर्देश दिए गए।
💡 ध्यान दें — CM-PACS का मतलब "मुख्यमंत्री-पैक्स" नहीं है, बल्कि Comprehensive Multi-Purpose Activities Cooperative Society है। यह हरियाणा की एक राज्य-विशिष्ट पहल है।
CM-PACS कोई अस्थायी सरकारी योजना नहीं, एक पूरी तरह रजिस्टर्ड, स्वतंत्र क़ानूनी संस्था है। हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 की धारा 4(1) के अनुसार कोई भी सोसाइटी तभी रजिस्टर हो सकती है जब उसका मक़सद "सहकारी सिद्धांतों के मुताबिक़ सदस्यों के आर्थिक हितों को बढ़ावा देना" हो — इसे "ऑब्जेक्ट टेस्ट" कहा जा सकता है। CM-PACS अधिनियम की धारा 2(o) के तहत एक "प्राइमरी सोसाइटी" के रूप में रजिस्टर होती है, जहाँ सिर्फ़ व्यक्ति सदस्य बनते हैं (कोई अन्य सोसाइटी नहीं) — ठीक उसी सामान्य ढाँचे में जिसमें पारंपरिक PACS भी आती है, पर मक़सद और दायरा बिल्कुल अलग।
रजिस्ट्रेशन के बाद धारा 39 के तहत हर सहकारी सोसाइटी एक "बॉडी कॉर्पोरेट" बन जाती है — यानी सदस्यों से अलग अपनी क़ानूनी पहचान, स्थायी उत्तराधिकार (perpetual succession), अपनी मुहर, अपने नाम पर संपत्ति रखने, अनुबंध करने और मुक़दमा दायर करने/किए जाने का अधिकार। धारा 9 के तहत रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट अपने आप में इस बात का "पक्का सबूत" (conclusive evidence) है कि सोसाइटी वैध रूप से रजिस्टर हो चुकी है — इसीलिए सर्टिफिकेट मिलते ही सोसाइटी बैंक खाता खोलने, ज़मीन ख़रीदने या सरकारी योजनाओं से जुड़ने जैसे काम शुरू कर पाती है।
💡 अगर सोसाइटी सीमित दायित्व (limited liability) के साथ रजिस्टर होती है, तो नाम के आख़िर में "Limited" शब्द जोड़ना धारा 4(2) के तहत अनिवार्य है — यह सदस्यों की सीमित ज़िम्मेदारी का साफ़ संकेत है।
इस मॉडल के पीछे एक साफ़ समस्या थी — पारंपरिक, सिर्फ़-साख वाली PACS अक्सर आर्थिक रूप से कमज़ोर व घाटे में रहती थीं, क्योंकि उनकी आय एक ही स्रोत (ऋण-ब्याज) पर टिकी थी। CM-PACS का बहुउद्देश्यीय मॉडल इसी का जवाब है: जब एक समिति ऋण के साथ-साथ इनपुट-आपूर्ति, गोदाम, प्रसंस्करण, डिजिटल सेवाएँ व कई अन्य कारोबार करे, तो उसकी आय के कई स्रोत बनते हैं और वह आत्मनिर्भर बनती है। साथ ही, गाँव के सदस्य को एक ही जगह अनेक सेवाएँ मिल जाती हैं। यानी CM-PACS का उद्देश्य है — कमज़ोर, एक-आयामी समिति को एक मज़बूत, बहु-आयामी, आत्मनिर्भर ग्रामीण संस्था में बदलना।
पारंपरिक PACS ज़्यादातर सिर्फ़ कृषि साख (credit) के इर्द-गिर्द बनी होती है। CM-PACS की सोच backward और forward — दोनों तरह की linkages को एक ही संस्था में लाने की है: खेती से पहले लगने वाली चीज़ें (बीज, खाद, सिंचाई, मशीनें) और खेती के बाद की ज़रूरतें (छँटाई, पैकेजिंग, ब्रांडिंग, मार्केटिंग, स्टोरेज) — और इससे भी आगे, दर्जनों तरह के गैर-कृषि कारोबार। बाइलॉज में मूल सिद्धांत साफ़ लिखा है: "All for one, One for all"।
Model Bye-laws में गतिविधियों की सूची असल में बहुत लंबी है। मोटे तौर पर इन्हें पाँच समूहों में देखा जा सकता है:
| समूह | उदाहरण गतिविधियाँ |
|---|---|
| कृषि इनपुट व आउटपुट | डेमो प्लॉट, सिंचाई, बीज, कस्टम हायरिंग सेंटर, ग्रेडिंग-पैकेजिंग-मार्केटिंग, कोल्ड-चेन/रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट |
| संबद्ध कृषि गतिविधियाँ | डेयरी, मछली-झींगा पालन, मुर्गी व मधुमक्खी पालन, बागवानी, भेड़-बकरी व सुअर पालन |
| दुकान-कारोबार व डीलरशिप | फेयर प्राइस शॉप, LPG/पेट्रोल/डीज़ल डीलरशिप, इंश्योरेंस, कृषि मशीनरी बिक्री |
| डिजिटल व सरकारी योजना सेवाएँ | Common Service Centre (CSC), जन औषधि केंद्र, हरियाणा एग्रो हरहित स्टोर, बिजली-पानी-टेलीफोन बिल कलेक्शन |
| गैर-कृषि/इंडस्ट्रियल | टैक्सी व स्टूडेंट ट्रांसपोर्ट, पार्किंग, निर्माण-ठेकेदारी, मैनपावर व सिक्योरिटी सेवा, फूड प्रोसेसिंग, कैटरिंग-टिफिन, इवेंट मैनेजमेंट |
इनमें से किसी भी regulated activity — जैसे पेट्रोल/डीज़ल आउटलेट, LPG, इंश्योरेंस या फूड बिज़नेस — के लिए संबंधित विभाग/कंपनी की अलग से eligibility, permission या licence लेना ख़ुद समिति की ज़िम्मेदारी है। बाइलॉज में objective होना अपने-आप उस बिज़नेस का लाइसेंस नहीं है — यह फ़र्क़ समझना बहुत ज़रूरी है, वरना समिति बिना अनुमति कोई regulated काम शुरू करके कानूनी जोखिम में पड़ सकती है।
⚠️ इतने सारे objectives होने का मतलब यह नहीं कि एक नई CM-PACS को सारे काम एक साथ शुरू कर देने चाहिए। व्यवहारिक शुरुआत के लिए पहले स्थानीय माँग देखें, सदस्यों की स्किल पहचानें, और दो-तीन गतिविधियों से शुरुआत करें — जैसे किसी कृषि-प्रधान क्षेत्र में Custom Hiring Centre + इनपुट सप्लाई + उपज एकत्रीकरण, या कस्बे के पास CSC + हरहित स्टोर + फूड प्रोसेसिंग।
समिति ज़मीन, भवन, गोदाम और प्रोसेसिंग यूनिट जैसी संपत्तियाँ ख़रीदने या किराए पर लेने के लिए भी अधिकृत है। अगर आगे चलकर कोई नई गतिविधि सामने आए जो इन उद्देश्यों से जुड़ी हो, तो सामान्य सभा (General Body) की मंज़ूरी और रजिस्ट्रार की अनुमति से उसे भी जोड़ा जा सकता है — यानी सूची पूरी तरह बंद नहीं है।
CM-PACS की सदस्यता के लिए कुछ शर्तें तय हैं: उम्र कम-से-कम 18 साल, भारतीय संविदा अधिनियम 1872 के तहत अनुबंध करने योग्य, समिति के कार्यक्षेत्र का निवासी, कम-से-कम 10+2 शैक्षणिक योग्यता, 5 एकड़ से ज़्यादा ज़मीन न होना, और पहले से किसी दूसरी CM-PACS का सदस्य न होना। राज्य सरकार और कोई बोर्ड/निगम/एजेंसी भी सदस्य बन सकती है।
जो लोग सदस्य नहीं बनना चाहते पर समिति से कारोबारी रिश्ता रखना चाहते हैं, वे ₹500 की एकबारगी, ग़ैर-वापसी-योग्य फ़ीस देकर एसोसिएट मेंबर बन सकते हैं — पर उन्हें वोट या चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं मिलता। यानी पूर्ण सदस्य (मालिकाना व मताधिकार सहित) और एसोसिएट सदस्य (सिर्फ़ कारोबारी संबंध) — दोनों की भूमिका अलग है।
आवेदन के साथ पहचान व ज़मीन के दस्तावेज़, KYC (परिवार पहचान पत्र व CIBIL सहित) देना ज़रूरी है; किसानों के लिए MFMB रजिस्ट्रेशन भी अनिवार्य है। कमेटी को आवेदन पर फ़ैसला लेने के लिए अधिकतम 3 महीने मिलते हैं। मंज़ूरी के बाद सदस्य को ₹1,000 प्रवेश शुल्क (non-refundable) और ₹1,000 का एक शेयर जमा करना होता है — शेयर सर्टिफिकेट मिलता है, जो 3 साल के लिए मान्य रहता है, फिर हर साल ₹5,000 देकर सदस्यता रिन्यू करानी होती है। सदस्यता छोड़ने के लिए कम-से-कम 3 साल सदस्य रहना, 3 महीने पहले लिखित सूचना देना ज़रूरी है, और तब शेयर का अधिकतम 90% ही वापस मिलता है (नुक़सान की भरपाई के बाद)।
समिति की आय के मुख्य स्रोत हैं — अपने कारोबार से होने वाली कमाई, सदस्यता व प्रवेश शुल्क, सदस्यों की शेयर पूँजी (प्रति शेयर ₹20,000 निर्धारित है), बैंकों/वित्तीय संस्थाओं से क़र्ज़, और केंद्र-राज्य सरकार व उनकी एजेंसियों से अनुदान-सब्सिडी। हर योजना की अपनी eligibility और शर्तें होती हैं — CM-PACS होने मात्र से हर सब्सिडी अपने-आप नहीं मिल जाती।
सर्वोच्च अधिकार सामान्य सभा (General Body) में निहित है, जिसमें सभी सदस्य (एसोसिएट छोड़कर) शामिल होते हैं और साल में कम-से-कम एक बैठक ज़रूरी है। रोज़मर्रा के फ़ैसले एक निर्वाचित कमेटी (7 से 21 सदस्य) लेती है, जिसमें अनुसूचित जाति, महिलाओं और पिछड़ा वर्ग का प्रतिनिधित्व धारा 28 के तहत अनिवार्य है। कमेटी का कार्यकाल 5 साल का होता है। ज़रूरत पड़ने पर अकाउंटिंग, फ़ाइनेंस, IT, क़ानून या सहकारिता प्रबंधन में विशेषज्ञता रखने वाले 2 प्रोफेशनल डायरेक्टर भी को-ऑप्ट किए जा सकते हैं (वोट के बिना)। रोज़-मर्रा का काम एक मैनेजर संभालता है, जिसे कमेटी अपने सदस्यों में से चुनती है।
📘 एक दिलचस्प व आधुनिक प्रावधान: हर सामान्य सभा और कमेटी बैठक को सोशल मीडिया पर लाइवस्ट्रीम करना और विभाग की वेबसाइट पर खोजने-योग्य तरीक़े से आर्काइव करना अनिवार्य है — पारदर्शिता बाइलॉज में ही बाँध दी गई है। समिति को अपनी वेबसाइट बनाना भी अनिवार्य है।
CM-PACS हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 और हरियाणा सहकारी समिति नियम 1989 के ढाँचे में ही काम करती है — कोई अलग विशेष क़ानून इसके लिए नहीं बनाया गया (देखें: अधिनियम 1984 व नियम 1989: पूरी गाइड)। यानी CM-PACS पर वही पंजीकरण, ऑडिट, चुनाव और विवाद-निपटान प्रक्रियाएँ लागू होती हैं जो किसी भी दूसरी प्राइमरी सोसाइटी पर लागू होती हैं।
चूँकि CM-PACS कई अलग-अलग कारोबार एक साथ कर सकती है, इसका हिसाब-किताब पारंपरिक PACS से ज़्यादा जटिल होता है — हर गतिविधि (ऋण, इनपुट-बिक्री, गोदाम, CSC, प्रोसेसिंग) की अलग आय-लागत, अलग स्टॉक, व अलग लाभप्रदता। अगर सबका हिसाब एक साथ मिला दिया जाए, तो यह पता ही नहीं चलेगा कि कौन-सी गतिविधि कमा रही है, कौन-सी घाटे में। इसलिए CM-PACS के लिए गतिविधि-वार (activity-wise) पारदर्शी लेखांकन बहुत ज़रूरी है — तभी प्रबंध समिति सही फ़ैसले ले सकती है और ऑडिट सहज रहता है। एक अच्छा सहकारी लेखा-सॉफ्टवेयर यह काम बहुत आसान कर देता है। (देखें: CM-PACS हिसाब-किताब, ऑडिट व टैक्स गाइड।)
CM-PACS का पूरा नाम क्या है? — Comprehensive Multi-Purpose Activities Cooperative Society; यह "मुख्यमंत्री-पैक्स" नहीं, बल्कि हरियाणा की एक बहुउद्देश्यीय, राज्य-विशिष्ट सहकारी पहल है। CM-PACS क्या सिर्फ़ खेती की समिति है? — नहीं; इसका दायरा कृषि इनपुट-आउटपुट से लेकर डिजिटल सेवाओं, ट्रांसपोर्ट, फूड प्रोसेसिंग और मैनपावर सेवाओं तक फैला है। क्या CM-PACS कोई अस्थायी सरकारी स्कीम है? — नहीं; धारा 39 के तहत यह एक स्थायी, रजिस्टर्ड बॉडी कॉर्पोरेट है, जिसकी अपनी क़ानूनी पहचान है। सदस्य बनने की क्या शर्तें हैं? — उम्र 18+, 10+2 योग्यता, 5 एकड़ से कम ज़मीन, समिति के कार्यक्षेत्र का निवासी, और पहले किसी अन्य CM-PACS का सदस्य न होना। हर गतिविधि तुरंत शुरू की जा सकती है? — बाइलॉज में objective होना लाइसेंस नहीं है; regulated गतिविधियों (पेट्रोल, LPG, इंश्योरेंस, फूड) के लिए अलग से approval चाहिए। CM-PACS क्यों बनाई गई? — कमज़ोर, एक-आयामी (सिर्फ़-साख) समिति को बहुउद्देश्यीय, आय के कई स्रोतों वाली आत्मनिर्भर संस्था में बदलने के लिए। हिसाब-किताब में क्या ख़ास ध्यान चाहिए? — कई कारोबार होने से गतिविधि-वार अलग, पारदर्शी लेखांकन ज़रूरी — ताकि हर गतिविधि की लाभप्रदता साफ़ दिखे। पूर्ण सदस्य व एसोसिएट सदस्य में फ़र्क़? — पूर्ण सदस्य को मालिकाना व मताधिकार; एसोसिएट सदस्य (₹500 फ़ीस) को सिर्फ़ कारोबारी संबंध, वोट/चुनाव नहीं।
CM-PACS हरियाणा की सहकारिता का एक महत्वाकांक्षी, आधुनिक रूप है — एक ऐसी संस्था जो गाँव की समिति को सिर्फ़ "खाद-बीज-कर्ज़" से आगे ले जाकर एक बहु-सेवा, आत्मनिर्भर आर्थिक इकाई बनाना चाहती है। पर इसकी सफलता दो बातों पर टिकी है: पहला, व्यावहारिक शुरुआत — सारे 50 काम एक साथ नहीं, बल्कि स्थानीय माँग व सदस्यों की क्षमता के अनुसार दो-तीन गतिविधियों से; और दूसरा, हर गतिविधि का साफ़, अलग, पारदर्शी हिसाब, ताकि पता रहे क्या कमा रहा है, क्या नहीं। सही सोच व सही हिसाब के साथ, CM-PACS एक कमज़ोर गाँव-समिति को एक मज़बूत, आत्मनिर्भर संस्था बना सकती है।
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जुड़े शब्द: CM-PACS · बॉडी कॉर्पोरेट · प्राइमरी सोसाइटी · Model Bye-laws · एसोसिएट मेंबर · General Body
📘 नोट: यह जानकारी हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 व नियम 1989, तथा CM-PACS Model Bye-laws (RCS हरियाणा मेमो PA/RCS/225-275, 25.12.2023) के संदर्भ में है। शेयर-राशि, शुल्क व शर्तें समिति के registered bye-laws व समय के अनुसार बदल सकती हैं — अपनी समिति/ARCS से पुष्टि करें। Evidence Level A (शैक्षिक)।
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