हरियाणा में CM-PACS सिर्फ़ नाम से "PACS" जैसी लगती हैं, पर इनका मक़सद परंपरागत कृषि-ऋण समितियों से अलग है। यह गाइड CM-PACS की मौजूदा संख्या के बाद, अब इनकी अवधारणा, सदस्यता ढांचे और गवर्नेंस मॉडल को समझाती है। साथ ही यह भी कि "Model Bye-laws" (आदर्श नियमावली) होते क्या हैं, और एक सदस्य या आयोजक को इनमें क्या-क्या देखना चाहिए।

CM-PACS का पूरा नाम और मक़सद

क्षेत्रीय रिपोर्टों के अनुसार CM-PACS का पूरा नाम "Comprehensive Multi-Purpose Activity Co-operative Society" बताया गया है। परंपरागत PACS जहां मुख्यतः कृषि ऋण व बीज वितरण तक सीमित रहती हैं, वहीं CM-PACS को पेट्रोल पंप संचालन, अनाज भंडारण (गोदाम), फ़सल खरीद और खाद्य प्रसंस्करण जैसी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए डिज़ाइन किया गया बताया जाता है — यानी यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय PACS मॉडल बाय-लॉज़ के बहुउद्देश्यीय दृष्टिकोण से मेल खाती अवधारणा है।

नाम में छिपा शब्द "Multi-Purpose" (बहुउद्देश्यीय) ही इसका असली संदेश है। सोच यह है कि गाँव-स्तर की सहकारी संस्था सिर्फ़ ऋण देने का ज़रिया न रहकर, गाँव की कई आर्थिक ज़रूरतों — आदान (खाद/बीज), भंडारण, बिक्री, ईंधन, प्रसंस्करण — को एक ही छत के नीचे पूरा करे। इससे सदस्य-किसान को हर सेवा के लिए अलग-अलग जगह भटकना नहीं पड़ता, और समिति की आमदनी के स्रोत भी विविध हो जाते हैं, जिससे वह आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ बनती है।

Model Bye-laws आख़िर होते क्या हैं

किसी भी सहकारी समिति की बाय-लॉज़ (उपनियम/नियमावली) उसका आंतरिक संविधान होती है — वह दस्तावेज़ जो तय करता है कि समिति किस मक़सद से बनी है, कौन सदस्य बन सकता है, कैसे चलेगी, फ़ैसले कौन लेगा, और मुनाफ़ा-नुक़सान का बँटवारा कैसे होगा। यह राज्य के सहकारी अधिनियम व नियमों के दायरे में रहते हुए बनाई जाती है, और पंजीकरण के समय रजिस्ट्रार (RCS/ARCS) से स्वीकृत होती है।

"Model Bye-laws" (आदर्श नियमावली) एक तैयार-नमूना होता है, जिसे सरकार या शीर्ष संस्था जारी करती है ताकि नई समितियाँ शून्य से नियमावली बनाने के बजाय एक मानक ढाँचे को अपनाकर, अपनी ज़रूरत के हिसाब से थोड़ा-बहुत बदलाव कर लें। इससे दो फ़ायदे होते हैं — नई समिति का गठन तेज़ होता है, और सभी समितियों में एकरूपता (uniformity) बनी रहती है, जिससे निगरानी व ऑडिट आसान होता है। CM-PACS के संदर्भ में भी यही अपेक्षा है कि एक मानक बहुउद्देश्यीय ढाँचा अपनाया जाए।

💡 सरल भाषा में: अधिनियम = राज्य का बड़ा क़ानून; नियम (Rules) = उसे लागू करने की प्रक्रिया; और बाय-लॉज़ = आपकी अपनी समिति के भीतर के नियम। तीनों में जब टकराव हो, तो अधिनियम सबसे ऊपर रहता है।

एक समिति के बाय-लॉज़ में आमतौर पर क्या-क्या होता है

चाहे CM-PACS हो या कोई और सहकारी समिति, उसकी नियमावली में सामान्यतः ये बिंदु शामिल होते हैं:

बिंदु क्या तय करता है
नाम व कार्यक्षेत्र समिति का नाम और वह गाँव/क्षेत्र जहाँ वह काम करेगी
उद्देश्य (Objects) समिति किन गतिविधियों के लिए बनी है (ऋण, भंडारण, बिक्री आदि)
सदस्यता कौन पात्र है, प्रवेश शुल्क, शेयर राशि, सदस्य के अधिकार व कर्तव्य
शेयर पूँजी प्रति सदस्य शेयर, अधिकतम सीमा, वापसी की शर्तें
बैठकें आम सभा (AGM), बोर्ड बैठकों की आवृत्ति व कोरम
प्रबंधन बोर्ड/प्रबंध समिति का गठन, चुनाव, कार्यकाल
निधियाँ रिज़र्व फंड, अन्य फंड, मुनाफ़े का विनियोजन
लेखा व ऑडिट खाता-रखरखाव, वार्षिक ऑडिट, रिपोर्टिंग
विवाद व विघटन विवाद-निपटान व समिति बंद होने की प्रक्रिया

जब आप किसी CM-PACS के सदस्य बनने या उसे बनाने जा रहे हों, तो इन्हीं बिंदुओं को उसकी स्वीकृत नियमावली में पढ़कर पुष्टि करना सबसे भरोसेमंद तरीक़ा है — क्योंकि यहाँ दिए सामान्य आँकड़े योजना-स्तर के हैं, जबकि आपकी समिति की सटीक शर्तें उसकी अपनी बाय-लॉज़ में लिखी होंगी।

कहां शुरू हो रही हैं — चरणबद्ध विस्तार

क्षेत्रीय रिपोर्टों के मुताबिक पहले चरण में करीब 500 गांवों में CM-PACS शुरू करने का लक्ष्य रखा गया, जबकि दीर्घकालिक लक्ष्य हरियाणा के उन सभी गांवों (कुल मिलाकर करीब 6,742 गांव बताए गए हैं) को कवर करना है, जहां अभी तक कोई परंपरागत PACS मौजूद नहीं है।

इस चरणबद्ध सोच का तर्क समझने लायक है। जिन गाँवों में पहले से कोई सक्रिय PACS है, वहाँ नई संस्था खड़ी करने के बजाय मौजूदा को मज़बूत करना बेहतर होता है। पर हरियाणा के हज़ारों गाँव ऐसे रहे हैं जहाँ कोई कार्यशील सहकारी संस्था नहीं थी — वहाँ किसान को ऋण, आदान व बिक्री के लिए निजी बाज़ार या दूर की संस्थाओं पर निर्भर रहना पड़ता था। CM-PACS का लक्ष्य इसी "सहकारी शून्य" को भरना है, ताकि हर गाँव में एक बहुउद्देश्यीय सहकारी केंद्र हो।

CM-PACS की गतिविधियाँ — विस्तार से

रिपोर्टों में बताई गई गतिविधियों को थोड़ा खोलकर देखें, तो हर एक का किसान-हित से सीधा नाता दिखता है:

ध्यान दें कि कोई भी समिति एक साथ ये सब गतिविधियाँ शुरू कर दे, यह ज़रूरी नहीं — व्यवहार में समिति अपनी क्षमता, पूँजी व गाँव की ज़रूरत के हिसाब से क्रमशः गतिविधियाँ जोड़ती है। कौन-सी गतिविधि उसकी अनुमत सूची में है, यह उसकी स्वीकृत नियमावली व पंजीकरण से तय होता है।

सदस्यता ढांचा — कितने सदस्य, कौन पात्र?

रिपोर्टों के अनुसार किसी CM-PACS के गठन के लिए न्यूनतम 11 सदस्य आवश्यक हैं, जबकि अधिकतम सदस्य संख्या की कोई सीमा नहीं रखी गई। सदस्यता 5 एकड़ तक भूमि वाले किसानों के साथ-साथ ग़ैर-कृषि श्रमिकों के लिए भी खुली बताई गई है — यानी यह सिर्फ़ बड़े किसानों तक सीमित मॉडल नहीं है।

यह "समावेशी सदस्यता" इस मॉडल की एक अहम ख़ूबी है। छोटे व सीमांत किसान, और गाँव के ग़ैर-कृषि श्रमिक — दोनों को जोड़कर, समिति गाँव के बड़े हिस्से की आर्थिक भागीदारी सुनिश्चित करती है। व्यवहार में सदस्य बनने की प्रक्रिया आमतौर पर इन क़दमों जैसी होती है (सटीक प्रक्रिया समिति की नियमावली पर निर्भर):

  1. निर्धारित प्रपत्र में सदस्यता-आवेदन भरना।
  2. पात्रता व दस्तावेज़ों की जाँच (पहचान, निवास व — जहाँ लागू — भूमि/किसान संबंधी विवरण)।
  3. बोर्ड/प्रबंध समिति द्वारा आवेदन की स्वीकृति।
  4. निर्धारित शेयर राशि व प्रवेश शुल्क (जहाँ लागू) जमा करना।
  5. सदस्य-रजिस्टर में नाम दर्ज होना — इसके बाद ही सदस्य के अधिकार (मतदान आदि) प्रभावी होते हैं।

शेयर राशि — ₹20,000 से घटाकर ₹1,000

शुरुआत में सदस्यता के लिए प्रस्तावित शेयर राशि ₹20,000 बताई गई थी, जिसे बाद में घटाकर ₹1,000 प्रति सदस्य कर दिया गया — और यह राशि वापसी योग्य (refundable) बताई गई है। यह हमारे CM-PACS Share Amount गाइड में उठाए गए सवाल का सीधा जवाब है, जहां हमने बताया था कि अधिनियम ख़ुद कोई तय शेयर राशि नहीं बताता — यह राशि योजना-विशेष रूप से प्रशासनिक स्तर पर तय की गई प्रतीत होती है।

इस कमी (₹20,000 → ₹1,000) के पीछे की मंशा साफ़ है — प्रवेश की आर्थिक बाधा घटाना, ताकि छोटे किसान व श्रमिक भी बिना बड़े निवेश के सदस्य बन सकें। "वापसी योग्य" होने का मतलब है कि यह राशि किसी शुल्क की तरह डूबती नहीं, बल्कि सदस्य की शेयर-पूँजी बनती है, जो नियमानुसार सदस्यता छोड़ने पर वापस मिल सकती है। पर वापसी की सटीक शर्तें (कब, कैसे, किन कटौतियों के साथ) हमेशा संबंधित समिति की बाय-लॉज़ से ही पुष्टि करें।

गवर्नेंस — समिति चलाता कौन है

हर सहकारी समिति का संचालन दो स्तरों पर होता है, और CM-PACS भी इसी सामान्य सहकारी ढाँचे का पालन करती है:

यही लोकतांत्रिक ढाँचा सहकारी संस्था को एक निजी कंपनी से अलग करता है — यहाँ नियंत्रण पूँजी के पास नहीं, बल्कि सदस्यों के पास होता है। इसलिए एक अच्छे सदस्य के लिए ज़रूरी है कि वह आम सभा में भाग ले, वार्षिक खाते देखे, और चुनाव में मतदान करे। (सामान्य सिद्धांतों के लिए देखें: सहकारिता के सिद्धांत व मूल्य।)

मुनाफ़े का बंटवारा

रिपोर्टों के मुताबिक CM-PACS के ज़रिए होने वाली व्यावसायिक गतिविधियों से अर्जित मुनाफ़े को सदस्यों में डिविडेंड के रूप में बांटने की व्यवस्था बताई गई है — यानी सिर्फ़ ऋण सुविधा नहीं, बल्कि सामूहिक व्यावसायिक भागीदारी का मॉडल।

सामान्य सहकारी-व्यवहार में शुद्ध लाभ (net surplus) सीधे पूरा नहीं बँटता — पहले नियमानुसार कुछ हिस्सा रिज़र्व फंड व अन्य वैधानिक निधियों में जाता है, और उसके बाद बचे अधिशेष में से डिविडेंड (शेयर पर) व — जहाँ लागू हो — संरक्षण-बोनस/पैट्रोनेज रिबेट (सदस्य ने समिति से कितना कारोबार किया, उस अनुपात में) दिया जा सकता है। यह विनियोजन (appropriation) आम सभा की मंज़ूरी से होता है। किस समिति में रिज़र्व/डिविडेंड का अनुपात क्या रहेगा, यह राज्य-नियमों व उसकी नियमावली पर निर्भर करता है।

⚠️ रिज़र्व-फंड प्रतिशत, डिविडेंड की सीमा व पैट्रोनेज-बोनस के नियम राज्य के सहकारी अधिनियम/नियमों व समिति की बाय-लॉज़ पर निर्भर हैं — इन्हें आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें।

बहु-गतिविधि समिति का हिसाब कैसे रखें

CM-PACS जैसी बहुउद्देश्यीय समिति के लिए सबसे बड़ी लेखांकन-चुनौती यही है कि एक ही संस्था कई अलग-अलग कारोबार (ऋण, आदान-बिक्री, गोदाम, पंप, प्रसंस्करण) एक साथ चलाती है। अगर सबका हिसाब एक ढेर में रखा जाए, तो यह पता ही नहीं चलेगा कि कौन-सी गतिविधि फ़ायदे में है और कौन-सी घाटे में। इसलिए ज़रूरी है गतिविधि-वार (activity-wise) हिसाब — हर कारोबार की अलग आय, अलग ख़र्च, अलग लाभ-हानि।

व्यवहार में इसका मतलब है — हर गतिविधि की बिक्री/खरीद को उसके अपने खाते में डालना (जैसे "खाद बिक्री", "गोदाम आय", "पंप बिक्री" अलग-अलग), स्टॉक का सही हिसाब रखना, और वर्षांत पर गतिविधि-वार व्यापार खाता बनाना। यही पारदर्शिता आम सभा में सदस्यों को साफ़ दिखाती है कि समिति का कौन-सा अंग कितना योगदान दे रहा है, और यही सही डिविडेंड-निर्णय की नींव भी है। एक अच्छा सहकारी-लेखांकन सॉफ़्टवेयर यह गतिविधि-वार विभाजन अपने-आप बना देता है, जिससे सचिव का बोझ घटता है और रिपोर्ट ऑडिट-रेडी रहती है। (देखें: सहकारी लेखांकन की मूल बातें व इन्वेंटरी व स्टॉक प्रबंधन।)

CM-PACS, PACS और राष्ट्रीय योजना — भ्रम मत कीजिए

यहाँ एक अहम स्पष्टीकरण ज़रूरी है, क्योंकि तीन अलग चीज़ें अक्सर एक-दूसरे से जोड़ दी जाती हैं:

इन तीनों को एक मानना ग़लत होगा। CM-PACS को इसके पूरे नाम (Comprehensive Multi-Purpose Activity Co-operative Society) से समझें, न कि किसी और शब्द-विस्तार से। सटीक दायरा व पात्रता के लिए अपने हरियाणा सहकारिता विभाग/ARCS कार्यालय की आधिकारिक जानकारी ही अंतिम मानें।

सदस्य या आयोजक — क्या तैयार रखें

अगर आप CM-PACS बनाने या उसमें जुड़ने की सोच रहे हैं, तो व्यावहारिक रूप से यह जाँच-सूची काम आएगी:

⚠️ इस लेख के आंकड़े (500 गांव, 6,742 गांव, ₹1,000 शेयर राशि, 11 सदस्य न्यूनतम) क्षेत्रीय समाचार रिपोर्टों पर आधारित हैं, किसी एक समेकित आधिकारिक दस्तावेज़ पर नहीं। पाठकों को सटीक व नवीनतम शर्तों के लिए अपने नज़दीकी ARCS कार्यालय से पुष्टि करने की सलाह है। यह जानकारी कानूनी सलाह नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

CM-PACS किन गतिविधियों के लिए बनाई गई हैं? — पेट्रोल पंप संचालन, अनाज भंडारण, फ़सल खरीद व खाद्य प्रसंस्करण जैसी व्यावसायिक गतिविधियों के लिए, परंपरागत PACS की कृषि-ऋण-केंद्रित भूमिका से आगे। CM-PACS का सदस्य बनने के लिए न्यूनतम कितने सदस्य चाहिए? — किसी CM-PACS के गठन के लिए न्यूनतम 11 सदस्य आवश्यक बताए गए हैं; अधिकतम की कोई सीमा नहीं। शेयर राशि क्या वापस मिलती है? — रिपोर्टों के मुताबिक ₹1,000 की शेयर राशि वापसी योग्य (refundable) बताई गई है, पर सटीक शर्त संबंधित समिति के बाय-लॉज़ से पुष्टि करें। Model Bye-laws क्या होते हैं? — किसी समिति की आंतरिक नियमावली का तैयार-नमूना, जिसे अपनाकर नई समिति जल्दी व मानक रूप से गठित हो सके; यह राज्य अधिनियम/नियमों के दायरे में रहती है और रजिस्ट्रार से स्वीकृत होती है। CM-PACS और परंपरागत PACS में मूल अंतर क्या है? — PACS मुख्यतः कृषि-ऋण-केंद्रित है, जबकि CM-PACS को बहुउद्देश्यीय व्यावसायिक गतिविधियों (पंप, गोदाम, खरीद, प्रसंस्करण) के लिए डिज़ाइन किया गया बताया जाता है। क्या CM-PACS पूरे देश में है? — क्षेत्रीय रिपोर्टों के अनुसार यह हरियाणा की एक पहल है; इसे राष्ट्रीय PACS कार्यक्रमों से न जोड़ें। सटीक दायरा ARCS/सहकारिता विभाग से पुष्टि करें। समिति का असली नियम कहाँ मिलेगा? — उसकी स्वीकृत बाय-लॉज़ में — सदस्यता, शेयर, बैठकें, बोर्ड, मुनाफ़ा-बंटवारा सब वहीं लिखा होता है; यहाँ दिए आँकड़े सामान्य/योजना-स्तर के हैं।

तीन बातें याद रखें

आख़िर में

CM-PACS का मूल विचार सरल पर ताक़तवर है — गाँव की सहकारी संस्था को सिर्फ़ ऋण-केंद्र से आगे बढ़ाकर एक बहुउद्देश्यीय आर्थिक केंद्र बनाना, जो किसान की कई ज़रूरतें एक जगह पूरी करे और अपनी आमदनी के स्रोत भी विविध रखे। पर असली सफलता ढाँचे में नहीं, अनुशासन में है — समावेशी सदस्यता, लोकतांत्रिक गवर्नेंस (एक सदस्य–एक वोट), गतिविधि-वार साफ़ हिसाब, और पारदर्शी मुनाफ़ा-बंटवारा। और चूँकि यहाँ के अधिकांश आँकड़े क्षेत्रीय रिपोर्टों पर आधारित हैं, कोई भी क़दम उठाने से पहले अपनी समिति की स्वीकृत बाय-लॉज़ व ARCS कार्यालय से पुष्टि ज़रूर कर लें।

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📘 स्रोत: क्षेत्रीय समाचार रिपोर्टें (CM-PACS की संख्या, गतिविधियाँ, सदस्यता व शेयर राशि) व सामान्य सहकारी-कानून सिद्धांत। योजना-विशिष्ट आँकड़े व शर्तें किसी एक समेकित आधिकारिक दस्तावेज़ से सत्यापित नहीं — हरियाणा सहकारिता विभाग/ARCS से पुष्टि करें। यह कानूनी सलाह नहीं है। Evidence Level B (क्षेत्रीय रिपोर्ट-आधारित)।

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