"हमारी समिति किस कानून के तहत चलती है?" — यह सवाल हर सचिव के मन में आता है। जवाब कुछ परतों में है। यह लेख सहकारी कानून के ढाँचे को आसान भाषा में समझाता है।
भारत में सहकारिता मुख्यतः राज्य का विषय है। इसलिए ज़्यादातर समितियाँ अपने राज्य के सहकारी समिति अधिनियम (जैसे हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984, महाराष्ट्र 1960) व उसके नियमों के तहत चलती हैं।
| परत | कब लागू |
|---|---|
| राज्य अधिनियम | एक राज्य की समिति |
| बहु-राज्य अधिनियम 2002 | कई राज्यों की समिति |
| उपविधि | हर समिति के अपने नियम |
⚠️ ध्यान दें: सटीक प्रावधान, धाराएँ व लागू होना राज्य अधिनियम, नियमों व न्यायिक व्याख्या पर निर्भर करते हैं — किसी क़ानूनी निर्णय के लिए अपने RCS/विशेषज्ञ से पुष्टि करें।
कानून तय करता है कि आरक्षित निधि कितनी रखनी है, ऑडिट कैसे हो, रिटर्न कब दें, ऋण की सीमा (जैसे धारा 32-प्रकार की सीमाएँ) क्या हो। इसलिए समिति का हिसाब इन्हीं नियमों के अनुरूप बनना चाहिए।
सहकारी समिति किस कानून के तहत चलती है? — मुख्यतः अपने राज्य के सहकारी अधिनियम व उपविधि के तहत। बहु-राज्य समिति पर कौन-सा कानून? — बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002। 97वें संशोधन ने क्या किया? — सहकारिता को संवैधानिक मान्यता दी व लोकतांत्रिक कामकाज पर ज़ोर। सहकारिता राज्य का विषय है या केंद्र का? — मुख्यतः राज्य का; बहु-राज्य मामलों में केंद्र का।
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