हर सहकारी समिति की अपनी एक "नियम-पुस्तक" होती है — इसे उपविधि (Bye-laws) कहते हैं। समिति कैसे चलेगी, इसका ज़्यादातर जवाब इसी में है। यह लेख आसान भाषा में बताता है कि उपविधि क्या हैं और क्यों ज़रूरी हैं।
उपविधि समिति के आंतरिक नियम हैं, जो सहकारी अधिनियम के दायरे में रहकर तय करते हैं कि समिति अपना कामकाज कैसे चलाएगी। ये अधिनियम से नीचे हैं — अधिनियम से टकराने वाला कोई नियम मान्य नहीं।
💡 सीधा नियम: कोई सवाल हो — "क्या यह किया जा सकता है?" — तो पहले उपविधि देखें, फिर अधिनियम।
उपविधि सीधे हिसाब को आकार देती हैं — आरक्षित निधि का %, डिविडेंड की सीमा, अंश-पूँजी नियम, ऑडिट-चक्र। इसलिए समिति का सॉफ्टवेयर व खाते उपविधि के अनुरूप होने चाहिए। (देखें: लाभ-वितरण व आरक्षित निधि।)
उपविधि क्या हैं? — समिति के अपने आंतरिक नियम, अधिनियम के दायरे में। क्या उपविधि अधिनियम से ऊपर हैं? — नहीं; अधिनियम से टकराव पर अधिनियम ही चलेगा। उपविधि कैसे बदलें? — आम सभा के प्रस्ताव व RCS की मंज़ूरी से (राज्य नियमों अनुसार)। मॉडल उपविधि क्या हैं? — RCS द्वारा दिया गया तैयार ढाँचा, जिसे समिति अपनाती है।
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