साल भर के काम के बाद जब समिति को लाभ (प्रॉफ़िट) होता है, तो सबसे अहम सवाल आता है — "अब इस लाभ का क्या करें?" इसे सीधे सदस्यों में बाँट देना सबसे आम और सबसे महँगी गलती है। सहकारी कानून कहता है कि लाभ एक तय क्रम में बाँटा जाए। यह लेख वही क्रम और उसका हिसाब आसान भाषा में समझाता है।
खरीद-बिक्री और आमदनी-खर्च के बाद जो लाभ (नेट प्रॉफ़िट) बचता है, उसे तय नियमों के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में बाँटा जाता है। यह बँटवारा साधारण सभा (General Body) मंज़ूर करती है। पूरा लाभ कभी डिविडेंड में नहीं जाता।
💡 लाभ निकलता कैसे है, यह समझने के लिए पहले रिपोर्ट्स कैसे पढ़ें देखें।
ज़्यादातर राज्यों के सहकारी कानून में लाभ इस क्रम में बँटता है:
⚠️ रेट और सीमाएँ हर राज्य के कानून और समिति के नियमों (बायलॉज़) के हिसाब से अलग होती हैं। अपनी समिति पर लागू मौजूदा रेट अपने नियम/सहकारी विभाग से ज़रूर पक्का कर लें — यह लेख सिर्फ़ हिसाब का तरीका बताता है।
यह वह फंड है जो समिति को मज़बूत बनाता है और मुश्किल वक़्त में काम आता है। आम तौर पर लाभ का कम-से-कम चौथाई हिस्सा (25%) इसमें डालना ज़रूरी होता है (सही रेट कानून पर निर्भर)।
उदाहरण: लाभ ₹1,00,000 → रिज़र्व फंड (25%) = ₹25,000।
एंट्री:
| खाता | Dr | Cr |
|---|---|---|
| लाभ बँटवारा खाता | ₹25,000 | — |
| रिज़र्व फंड | — | ₹25,000 |
समिति के नियमों के हिसाब से सहकारी शिक्षा फंड, कल्याण फंड वगैरह के लिए छोटे हिस्से अलग रखे जाते हैं। इन्हें भी डिविडेंड से पहले निकालें। हर फंड का अलग खाता रखें ताकि ऑडिट में साफ़ दिखे।
डिविडेंड और बोनस सिर्फ़ बची हुई रकम से ही दिया जा सकता है:
📘 बाँटने लायक लाभ = कुल लाभ − रिज़र्व फंड − बाकी ज़रूरी फंड
डिविडेंड सदस्यों की शेयर कैपिटल पर, तय रेट तक दिया जाता है। पहले यह देनदारी बनता है, फिर भुगतान पर घटता है।
घोषणा के समय:
| खाता | Dr | Cr |
|---|---|---|
| लाभ बँटवारा खाता | ₹X | — |
| देय डिविडेंड (देनदारी) | — | ₹X |
भुगतान पर देय डिविडेंड Dr और नकद/बैंक Cr। (शेयर का सही रिकॉर्ड ज़रूरी है — देखें सदस्य व शेयर रजिस्टर।)
यह सदस्य के काम के हिसाब से मिलता है — जिसने समिति से जितनी ज़्यादा खरीद/बिक्री की, उसे उतना ज़्यादा। यह सहकारिता के "सेवा पहले, लाभ बाद में" वाले सिद्धांत को दिखाता है। इसका हिसाब भी डिविडेंड जैसा ही (बँटवारा → देनदारी → भुगतान)।
| मद | रकम |
|---|---|
| कुल लाभ | ₹1,00,000 |
| (−) रिज़र्व फंड (25%) | ₹25,000 |
| (−) सहकारी शिक्षा/कल्याण फंड | ₹3,000 |
| बाँटने लायक लाभ | ₹72,000 |
| (−) डिविडेंड (शेयर पर) | ₹50,000 |
| (−) बोनस (व्यवहार बोनस) | ₹15,000 |
| बचा (आगे ले जाएँ) | ₹7,000 |
⚠️ सबसे बड़ी गलती — बाँटने लायक लाभ से ज़्यादा बाँट देना। इससे समिति की कैपिटल घटती है और यह सीधे ऑडिट में पकड़ी जाती है। बँटवारा कभी "बाँटने लायक लाभ" से ज़्यादा न हो। (ऐसी और गलतियों के लिए देखें 10 आम गलतियाँ।)
लाभ का बँटवारा सहकारिता की असली पहचान है — पहले समिति को मज़बूत करना (रिज़र्व), फिर सदस्यों को उनका सही हिस्सा (डिविडेंड और बोनस)। सही क्रम और सही एंट्री से यह साफ़-सुथरा और ऑडिट-रेडी रहता है।
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