लाभ का बँटवारा: रिज़र्व फंड, डिविडेंड और बोनस

साल भर के काम के बाद जब समिति को लाभ (प्रॉफ़िट) होता है, तो सबसे अहम सवाल आता है — "अब इस लाभ का क्या करें?" इसे सीधे सदस्यों में बाँट देना सबसे आम और सबसे महँगी गलती है। सहकारी कानून कहता है कि लाभ एक तय क्रम में बाँटा जाए। यह लेख वही क्रम और उसका हिसाब आसान भाषा में समझाता है।

पहले समझें: लाभ सोच-समझकर बाँटा जाता है

खरीद-बिक्री और आमदनी-खर्च के बाद जो लाभ (नेट प्रॉफ़िट) बचता है, उसे तय नियमों के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में बाँटा जाता है। यह बँटवारा साधारण सभा (General Body) मंज़ूर करती है। पूरा लाभ कभी डिविडेंड में नहीं जाता।

💡 लाभ निकलता कैसे है, यह समझने के लिए पहले रिपोर्ट्स कैसे पढ़ें देखें।

बाँटने का सही क्रम

ज़्यादातर राज्यों के सहकारी कानून में लाभ इस क्रम में बँटता है:

  1. रिज़र्व फंड — सबसे पहले (कानूनन ज़रूरी)।
  2. बाकी ज़रूरी फंड — सहकारी शिक्षा फंड, सदस्य-कल्याण/भवन फंड वगैरह (जैसा समिति के नियम कहें)।
  3. डिविडेंड — सदस्यों की शेयर कैपिटल पर, तय रेट तक।
  4. बोनस (व्यवहार बोनस) — सदस्य ने समिति से कितना काम किया (खरीद/बिक्री), उसके हिसाब से।
  5. बचा हुआ — अगले साल के लिए आगे ले जाएँ।

⚠️ रेट और सीमाएँ हर राज्य के कानून और समिति के नियमों (बायलॉज़) के हिसाब से अलग होती हैं। अपनी समिति पर लागू मौजूदा रेट अपने नियम/सहकारी विभाग से ज़रूर पक्का कर लें — यह लेख सिर्फ़ हिसाब का तरीका बताता है।

1. रिज़र्व फंड (सबसे पहले)

यह वह फंड है जो समिति को मज़बूत बनाता है और मुश्किल वक़्त में काम आता है। आम तौर पर लाभ का कम-से-कम चौथाई हिस्सा (25%) इसमें डालना ज़रूरी होता है (सही रेट कानून पर निर्भर)।

उदाहरण: लाभ ₹1,00,000 → रिज़र्व फंड (25%) = ₹25,000।

एंट्री:

खाता Dr Cr
लाभ बँटवारा खाता ₹25,000
रिज़र्व फंड ₹25,000

2. बाकी ज़रूरी फंड

समिति के नियमों के हिसाब से सहकारी शिक्षा फंड, कल्याण फंड वगैरह के लिए छोटे हिस्से अलग रखे जाते हैं। इन्हें भी डिविडेंड से पहले निकालें। हर फंड का अलग खाता रखें ताकि ऑडिट में साफ़ दिखे।

3. अब बचा "बाँटने लायक लाभ"

डिविडेंड और बोनस सिर्फ़ बची हुई रकम से ही दिया जा सकता है:

📘 बाँटने लायक लाभ = कुल लाभ − रिज़र्व फंड − बाकी ज़रूरी फंड

4. डिविडेंड (शेयर पर)

डिविडेंड सदस्यों की शेयर कैपिटल पर, तय रेट तक दिया जाता है। पहले यह देनदारी बनता है, फिर भुगतान पर घटता है।

घोषणा के समय:

खाता Dr Cr
लाभ बँटवारा खाता ₹X
देय डिविडेंड (देनदारी) ₹X

भुगतान पर देय डिविडेंड Dr और नकद/बैंक Cr। (शेयर का सही रिकॉर्ड ज़रूरी है — देखें सदस्य व शेयर रजिस्टर।)

5. बोनस (व्यवहार बोनस)

यह सदस्य के काम के हिसाब से मिलता है — जिसने समिति से जितनी ज़्यादा खरीद/बिक्री की, उसे उतना ज़्यादा। यह सहकारिता के "सेवा पहले, लाभ बाद में" वाले सिद्धांत को दिखाता है। इसका हिसाब भी डिविडेंड जैसा ही (बँटवारा → देनदारी → भुगतान)।

एक नज़र में: ₹1,00,000 लाभ का उदाहरण

मद रकम
कुल लाभ ₹1,00,000
(−) रिज़र्व फंड (25%) ₹25,000
(−) सहकारी शिक्षा/कल्याण फंड ₹3,000
बाँटने लायक लाभ ₹72,000
(−) डिविडेंड (शेयर पर) ₹50,000
(−) बोनस (व्यवहार बोनस) ₹15,000
बचा (आगे ले जाएँ) ₹7,000

ज़रूरत से ज़्यादा मत बाँटिए

⚠️ सबसे बड़ी गलती — बाँटने लायक लाभ से ज़्यादा बाँट देना। इससे समिति की कैपिटल घटती है और यह सीधे ऑडिट में पकड़ी जाती है। बँटवारा कभी "बाँटने लायक लाभ" से ज़्यादा न हो। (ऐसी और गलतियों के लिए देखें 10 आम गलतियाँ।)

तीन बातें याद रखें

आख़िर में

लाभ का बँटवारा सहकारिता की असली पहचान है — पहले समिति को मज़बूत करना (रिज़र्व), फिर सदस्यों को उनका सही हिस्सा (डिविडेंड और बोनस)। सही क्रम और सही एंट्री से यह साफ़-सुथरा और ऑडिट-रेडी रहता है।

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