साल भर के काम के बाद जब समिति को लाभ (प्रॉफ़िट) होता है, तो सबसे अहम सवाल आता है — "अब इस लाभ का क्या करें?" इसे सीधे सदस्यों में बाँट देना सबसे आम और सबसे महँगी गलती है। सहकारी कानून कहता है कि लाभ एक तय क्रम में बाँटा जाए। यह लेख वही क्रम और उसका हिसाब आसान भाषा में समझाता है।
खरीद-बिक्री और आमदनी-खर्च के बाद जो लाभ (नेट प्रॉफ़िट) बचता है, उसे तय नियमों के हिसाब से अलग-अलग हिस्सों में बाँटा जाता है। यह बँटवारा साधारण सभा (General Body) मंज़ूर करती है। पूरा लाभ कभी डिविडेंड में नहीं जाता।
💡 लाभ निकलता कैसे है, यह समझने के लिए पहले रिपोर्ट्स कैसे पढ़ें देखें।
सहकारी समिति में इस "लाभ" को अक्सर अधिशेष (surplus) भी कहा जाता है, क्योंकि उद्देश्य सिर्फ़ मुनाफ़ा कमाना नहीं, बल्कि सदस्यों को सेवा देना है। नाम चाहे जो हो, बँटवारे का नियम-क्रम एक ही रहता है।
बँटवारे से पहले यह समझना ज़रूरी है कि जिस "लाभ" की बात हो रही है, वह आया कहाँ से। साल भर की आय में से सारे खर्च घटाने के बाद जो बचता है, वही शुद्ध लाभ (नेट प्रॉफ़िट) है — यह आय-व्यय खाते (Income & Expenditure) से निकलता है:
📘 नेट प्रॉफ़िट = कुल आय − कुल व्यय
इसमें बिक्री-लाभ, ब्याज, कमीशन जैसी सारी आय, और वेतन, किराया, ब्याज-भुगतान, मूल्यह्रास जैसे सारे खर्च शामिल होते हैं। यही अंतिम आँकड़ा बँटवारे का आधार बनता है — इसलिए बँटवारा तभी सही होगा जब आय-व्यय खाता सही बना हो। (देखें: सहकारी लेखांकन की मूल बातें।)
ज़्यादातर राज्यों के सहकारी कानून में लाभ इस क्रम में बँटता है:
⚠️ रेट और सीमाएँ हर राज्य के कानून और समिति के नियमों (बायलॉज़) के हिसाब से अलग होती हैं। अपनी समिति पर लागू मौजूदा रेट अपने नियम/सहकारी विभाग से ज़रूर पक्का कर लें — यह लेख सिर्फ़ हिसाब का तरीका बताता है।
यह वह फंड है जो समिति को मज़बूत बनाता है और मुश्किल वक़्त में काम आता है। आम तौर पर लाभ का कम-से-कम चौथाई हिस्सा (25%) इसमें डालना ज़रूरी होता है (सही रेट कानून पर निर्भर)।
उदाहरण: लाभ ₹1,00,000 → रिज़र्व फंड (25%) = ₹25,000। (यहाँ 25% केवल एक उदाहरण-दर है; आपकी समिति पर लागू ठीक दर नीचे नियम-74 वाले खंड में देखें।)
एंट्री:
| खाता | Dr | Cr |
|---|---|---|
| लाभ बँटवारा खाता | ₹25,000 | — |
| रिज़र्व फंड | — | ₹25,000 |
ऊपर बताया 25% सामान्य/अधिकतम उदाहरण है — हरियाणा सहकारी समिति नियम, 1989 का नियम 74 असल सीमा यह तय करता है: नेट प्रॉफ़िट का कम-से-कम 10% (एक-दसवां हिस्सा) रिज़र्व फंड में अनिवार्य है; रजिस्ट्रार आदेश से इसे बढ़ा सकता है, पर 25% (एक-चौथाई) से ज़्यादा नहीं। यानी क़ानूनी दायरा 10%–25% है — अपनी समिति पर लागू ठीक दर उपविधि/रजिस्ट्रार आदेश से पक्की करें।
⚠️ नियम 74(2): रिज़र्व फंड "अविभाज्य" है — किसी सदस्य का इसमें कोई तय हिस्सा नहीं बनता (यह शेयर कैपिटल से अलग है)। नियम 74(3): अगर यह फंड कहीं निवेशित/जमा है, तो उसे निकाला, गिरवी रखा या किसी और मकसद में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता — घाटा-भरपाई के लिए भी पहले रजिस्ट्रार की मंज़ूरी ज़रूरी है।
रिज़र्व फंड समिति की "आपातकालीन बचत" जैसा है — यह कोई बेकार पड़ी रकम नहीं:
इसीलिए कानून इसे "अविभाज्य" रखता है — किसी सदस्य का इसमें अलग हिस्सा नहीं बनता, और यह शेयर कैपिटल से पूरी तरह अलग है।
समिति के नियमों के हिसाब से सहकारी शिक्षा फंड, कल्याण फंड वगैरह के लिए छोटे हिस्से अलग रखे जाते हैं। इन्हें भी डिविडेंड से पहले निकालें। हर फंड का अलग खाता रखें ताकि ऑडिट में साफ़ दिखे।
इन फंडों का अपना मक़सद होता है — सहकारी शिक्षा फंड सदस्यों/कर्मचारियों के प्रशिक्षण व सहकारी जागरूकता के लिए, कल्याण फंड सदस्य-हित की गतिविधियों के लिए, भवन फंड समिति के अपने ढाँचे के लिए। कौन-से फंड, कितने प्रतिशत पर लागू हैं, यह आपकी उपविधि व राज्य-कानून तय करते हैं — इसलिए अपनी समिति की सूची व दरें उपविधि से मिला लें।
डिविडेंड और बोनस सिर्फ़ बची हुई रकम से ही दिया जा सकता है:
📘 बाँटने लायक लाभ = कुल लाभ − रिज़र्व फंड − बाकी ज़रूरी फंड
डिविडेंड सदस्यों की शेयर कैपिटल पर, तय रेट तक दिया जाता है। पहले यह देनदारी बनता है, फिर भुगतान पर घटता है।
घोषणा के समय:
| खाता | Dr | Cr |
|---|---|---|
| लाभ बँटवारा खाता | ₹X | — |
| देय डिविडेंड (देनदारी) | — | ₹X |
भुगतान पर देय डिविडेंड Dr और नकद/बैंक Cr। (शेयर का सही रिकॉर्ड ज़रूरी है — देखें सदस्य व शेयर रजिस्टर।)
यह सदस्य के काम के हिसाब से मिलता है — जिसने समिति से जितनी ज़्यादा खरीद/बिक्री की, उसे उतना ज़्यादा। यह सहकारिता के "सेवा पहले, लाभ बाद में" वाले सिद्धांत को दिखाता है। इसका हिसाब भी डिविडेंड जैसा ही (बँटवारा → देनदारी → भुगतान)।
दोनों सदस्यों को मिलते हैं, पर आधार बिल्कुल अलग है:
| पहलू | डिविडेंड | व्यवहार बोनस |
|---|---|---|
| आधार | धारित शेयर कैपिटल | समिति से किया व्यवहार (खरीद/बिक्री) |
| किसे ज़्यादा | जिसके ज़्यादा शेयर | जिसने ज़्यादा लेन-देन किया |
| सिद्धांत | पूँजी पर प्रतिफल | सेवा/संरक्षण पर प्रतिफल |
🔍 यही "व्यवहार बोनस" सहकारी समिति को एक साधारण कंपनी से अलग करता है — यहाँ सिर्फ़ पूँजी नहीं, समिति के साथ किया गया काम भी पुरस्कृत होता है।
| मद | रकम |
|---|---|
| कुल लाभ | ₹1,00,000 |
| (−) रिज़र्व फंड (25%) | ₹25,000 |
| (−) सहकारी शिक्षा/कल्याण फंड | ₹3,000 |
| बाँटने लायक लाभ | ₹72,000 |
| (−) डिविडेंड (शेयर पर) | ₹50,000 |
| (−) बोनस (व्यवहार बोनस) | ₹15,000 |
| बचा (आगे ले जाएँ) | ₹7,000 |
ऊपर के ₹1,00,000 वाले उदाहरण को अब एंट्री के रूप में देखें। मान लीजिए साधारण सभा ने सब मंज़ूर किया:
| कदम | Dr | Cr | राशि |
|---|---|---|---|
| 1. रिज़र्व फंड | लाभ बँटवारा | रिज़र्व फंड | ₹25,000 |
| 2. शिक्षा/कल्याण फंड | लाभ बँटवारा | संबंधित फंड | ₹3,000 |
| 3. डिविडेंड (घोषणा) | लाभ बँटवारा | देय डिविडेंड | ₹50,000 |
| 4. बोनस (घोषणा) | लाभ बँटवारा | देय बोनस | ₹15,000 |
चारों Cr फंड/देनदारी बढ़ाते हैं, और "लाभ बँटवारा खाता" घटता जाता है। बचा ₹7,000 अगले वर्ष आगे ले जाया जाता है। बाद में डिविडेंड व बोनस का भुगतान होने पर वे देनदारियाँ घटती हैं और नकद/बैंक कम होता है।
🔍 ध्यान दें — यहाँ कुल बँटवारा (25,000 + 3,000 + 50,000 + 15,000 = 93,000) कुल लाभ ₹1,00,000 से कम है। यही सही स्थिति है; बँटवारा कभी लाभ से ज़्यादा न हो।
⚠️ सबसे बड़ी गलती — बाँटने लायक लाभ से ज़्यादा बाँट देना। इससे समिति की कैपिटल घटती है और यह सीधे ऑडिट में पकड़ी जाती है। बँटवारा कभी "बाँटने लायक लाभ" से ज़्यादा न हो। (ऐसी और गलतियों के लिए देखें 10 आम गलतियाँ।)
बँटवारे की एंट्री के बाद तस्वीर ऐसी दिखती है:
इसलिए सही बँटवारा सिर्फ़ नियम-पालन नहीं — यह अगले वर्ष की ओपनिंग व बैलेंस शीट को भी सही रखता है। (और जानें: रिपोर्ट्स कैसे पढ़ें।)
क्या पूरा लाभ सदस्यों में बाँट सकते हैं? — नहीं; पहले रिज़र्व व अन्य ज़रूरी फंड निकालें, फिर बची रकम से डिविडेंड/बोनस। बाँटने का सही क्रम क्या है? — रिज़र्व फंड → अन्य ज़रूरी फंड → डिविडेंड → व्यवहार बोनस → बचा हुआ आगे। रिज़र्व फंड में कितना डालना ज़रूरी है? — हरियाणा नियम 74 के अनुसार नेट प्रॉफ़िट का कम-से-कम 10%, रजिस्ट्रार आदेश से अधिकतम 25% तक; अपनी सटीक दर उपविधि/रजिस्ट्रार आदेश से पक्की करें। डिविडेंड और बोनस में फर्क? — डिविडेंड शेयर कैपिटल पर, बोनस समिति से किए व्यवहार (खरीद/बिक्री) पर। बँटवारा कौन मंज़ूर करता है? — साधारण सभा (General Body), नियम/उपविधि के अनुसार। क्या रिज़र्व फंड को घाटा-भरपाई में इस्तेमाल कर सकते हैं? — हाँ, पर हरियाणा नियम 74(3) के अनुसार पहले रजिस्ट्रार की मंज़ूरी ज़रूरी। बाँटने लायक लाभ कैसे निकालें? — कुल लाभ − रिज़र्व फंड − अन्य ज़रूरी फंड। नेट प्रॉफ़िट कहाँ से आता है? — आय-व्यय खाते से: कुल आय − कुल व्यय; यही बँटवारे का आधार है। बचा हुआ लाभ कहाँ जाता है? — अगले वर्ष के लिए आगे ले जाया जाता है (carry-forward), और अगले वर्ष की ओपनिंग बनता है।
लाभ का बँटवारा सहकारिता की असली पहचान है — पहले समिति को मज़बूत करना (रिज़र्व), फिर सदस्यों को उनका सही हिस्सा (डिविडेंड और बोनस)। सही क्रम, साधारण सभा की मंज़ूरी और अलग-अलग खाते — इन तीन बातों से यह बँटवारा साफ़-सुथरा और ऑडिट-रेडी रहता है। और सबसे ज़रूरी: बँटवारा कभी "बाँटने लायक लाभ" की सीमा से बाहर न जाए।
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अधिक जानें: सदस्य व शेयर रजिस्टर · सहकारी लेखांकन की मूल बातें · 10 आम गलतियाँ।
जुड़े शब्द: रिज़र्व फंड · डिविडेंड · व्यवहार बोनस · नेट प्रॉफ़िट · बाँटने लायक लाभ
📘 यह लेख उपरोक्त स्रोतों + सक्रिय Knowledge Items से बना — Evidence Level A/B। नोट: रिज़र्व-दर व अन्य सीमाएँ राज्य/उपविधि से बदलती हैं — अपनी समिति पर लागू सटीक दर सहकारी विभाग/रजिस्ट्रार आदेश से पुष्टि करें।
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