हरियाणा में सहकारिता की कहानी किसी एक गांव की क्रेडिट सोसाइटी या किसी एक खरीद केंद्र की कहानी नहीं है — यह क़रीब आठ दशकों का सफ़र है, जिसमें ग्रामीण ऋण से शुरू होकर कृषि विपणन, खाद-बीज वितरण, खाद्यान्न खरीद, डेयरी, चीनी उद्योग, श्रम-निर्माण और अब डिजिटल बहुउद्देशीय सहकारी कारोबार तक का रास्ता तय हुआ है। इस इतिहास को समझना सिर्फ़ जानकारी के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए ज़रूरी है कि आज की PACS, CM-PACS या HAFED जैसी संस्थाएं जिस ढांचे में काम करती हैं, वह कहाँ से आया।
आज के हरियाणा की सहकारिता का इतिहास 1 नवंबर 1966 से शुरू नहीं होता। आज़ादी के बाद लगभग दो दशकों तक वर्तमान हरियाणा का क्षेत्र तत्कालीन पंजाब का हिस्सा था, और यहाँ की cooperative societies उसी दौर के पंजाब कानूनी ढांचे — Punjab Cooperative Societies Act, 1961 — के अंतर्गत काम करती थीं।
📘 Haryana State Cooperative Agriculture and Rural Development Bank जैसी संस्थाओं के आधिकारिक इतिहास में भी इसका सीधा प्रमाण मिलता है — इसकी मूल संस्था अक्टूबर 1966 में Punjab Cooperative Societies Act, 1961 के तहत ही रजिस्टर हुई थी। इसी दौर में labour cooperatives के शुरुआती स्वरूप भी दिखते हैं — 1960 के दशक की शुरुआत में dams व canals से जुड़े earthwork के लिए बनी समितियां, जो बाद में skilled construction तक फैलीं।
Punjab Reorganisation Act, 1966 के तहत 1 नवंबर 1966 से नया हरियाणा राज्य अस्तित्व में आया, और इसी के साथ राज्य की आधुनिक cooperative institutional architecture का बड़ा हिस्सा एक साथ खड़ा हुआ — एक ही तरह की संस्था पर निर्भर रहने के बजाय, अलग-अलग आर्थिक ज़रूरतों के लिए अलग-अलग institutional chains बनाई गईं।
| क्षेत्र | प्रमुख संस्थागत व्यवस्था | मूल उद्देश्य |
|---|---|---|
| अल्पकालीन कृषि/ग्रामीण ऋण | HARCO Bank – DCCB – PACS ढांचा | किसानों व ग्रामीण सदस्यों तक credit |
| दीर्घकालीन कृषि वित्त | HSCARDB व district banks | सिंचाई, मशीनरी, भूमि विकास |
| कृषि विपणन व खरीद | HAFED व affiliated societies | inputs, procurement, marketing, processing |
| चीनी उद्योग | Sugarfed व cooperative sugar mills | गन्ना processing व किसान linkage |
| श्रम व निर्माण | Labourfed व primary L&C societies | रोज़गार व निर्माण कार्य |
| Cooperative education | HARCOFED | सदस्य, बोर्ड व कर्मचारियों का प्रशिक्षण |
| डेयरी | Dairy Federation/Milk Unions | दूध procurement, processing, marketing |
HAFED (Haryana State Cooperative Supply and Marketing Federation) भी 1 नवंबर 1966 को अस्तित्व में आया और आज राज्य की सबसे बड़ी apex cooperative federation है। शुरुआत में इसका मक़सद खाद-बीज-कीटनाशक जैसे inputs उपलब्ध कराना और उपज की marketing-processing था, पर समय के साथ गेहूं-धान जैसे foodgrains की procurement भी इसके प्रमुख कामों में शामिल हो गई — यानी cooperative system किसान के लिए सिर्फ़ ऋण का साधन नहीं रहा, बल्कि बुवाई-पूर्व input supply से लेकर कटाई के बाद procurement और आगे processing-marketing तक हर चरण में मौजूद हो गया।
HARCO Bank नवंबर 1966 से विकसित उस ढांचे का शीर्ष है, जिसमें राज्य-स्तर पर HARCO Bank, ज़िला-स्तर पर 19 Central Cooperative Banks और गांव-स्तर पर PACS/PCCS/FSS मौजूद हैं।
⚠️ अलग-अलग सरकारी दस्तावेज़ों में PACS की संख्या अलग-अलग मिलती है — कहीं 804, कहीं 805 PACS/PCCS/FSS, तो PACS computerisation की sanctioned संख्या 710। ये तीनों आंकड़े एक ही चीज़ नहीं नापते। किसी भी विश्लेषण में "कुल PACS", "PACS/PCCS/FSS" और "computerisation project में शामिल PACS" को अलग-अलग पढ़ना ज़रूरी है।
अल्पकालीन फसल ऋण के समानांतर, हरियाणा ने दीर्घकालीन कृषि निवेश के लिए अलग व्यवस्था बनाई। Haryana State Cooperative Agriculture and Rural Development Bank की शुरुआत सात Primary Cooperative Agriculture and Rural Development Banks से हुई थी, जो बाद में 87 तक पहुंचीं और 2008 के पुनर्गठन में 19 ज़िला-स्तरीय बैंकों में समाहित कर दी गईं।
📘 यह ढांचा सिंचाई, farm machinery, बागवानी, डेयरी, मछली पालन और ग्रामीण गोदामों जैसी उत्पादक परिसंपत्तियों के लिए दीर्घकालीन पूंजी उपलब्ध कराता आया है — यानी किसान को सिर्फ़ मौसमी फसल ऋण देने के बजाय, संपत्ति-निर्माण के लिए पूंजी देना। साथ ही यह भी उतना ही सच है कि लंबी अवधि के इस तरह के ऋण ढांचों में recovery व accumulated-losses का दबाव एक structural चुनौती रहा है — यह किसी संस्था या व्यक्ति पर आरोप नहीं, बल्कि दीर्घकालीन सहकारी वित्त की एक आम चुनौती है।
Sugarfed (Haryana State Federation of Cooperative Sugar Mills) की स्थापना भी 1966 में cooperative sugar mills की क्षमता बढ़ाने के लिए हुई थी। समय के साथ यह मॉडल सिर्फ़ गन्ने से चीनी बनाने तक सीमित नहीं रहा — बगास से सह-उत्पादन बिजली (cogeneration) और शीरे से एथेनॉल जैसे by-product-आधारित मॉडल भी इसमें जुड़े, ताकि मिलों की अतिरिक्त कमाई हो और घाटा घटे।
सहकारिता को सिर्फ़ किसान और PACS तक सीमित समझने पर labour cooperative sector अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाता है। Haryana State Cooperative Labour & Construction Federation 24 अक्टूबर 1966 को रजिस्टर हुई थी, और शुरुआती labour cooperatives dams-canals से जुड़े earthwork के लिए मज़दूरों को संगठित करने के लिए बनी थीं — यानी cooperative मॉडल की एक बिल्कुल अलग भूमिका: किसान को credit या marketing देने के बजाय, श्रमिकों को सामूहिक रूप से work contracts तक पहुंचाना।
हरियाणा राज्य बनने के दिन ही, 1 नवंबर 1966 को, तत्कालीन Punjab State Cooperative Union के विभाजन से HARCOFED अस्तित्व में आया — सदस्य शिक्षा, कोऑपरेटिव लीडरशिप, प्रबंध समिति सदस्यों व कर्मचारियों की ट्रेनिंग के लिए।
💡 यह डिज़ाइन अपने आप में एक अहम संकेत है — cooperative society को सिर्फ़ पूंजी और रजिस्ट्रेशन से नहीं चलाया जा सकता। चूंकि स्वामित्व व गवर्नेंस सदस्यों के हाथ में होती है, सदस्य-शिक्षा, बोर्ड की क्षमता और प्रशिक्षित स्टाफ़ किसी भी सहकारी संस्था के आर्थिक मॉडल का उतना ही ज़रूरी हिस्सा हैं जितनी पूंजी।
Haryana Dairy Corporation 1970 में बनी और 1977 तक काम करती रही, जिसके बाद dairy business को Federation ने संभाला और Anand Pattern पर आधारित three-tier cooperative ढांचे की दिशा में काम शुरू हुआ। इसी संस्थागत आधार से हरियाणा में VITA ब्रांड जुड़ा — जिसका मूल विचार यह था कि दूध उत्पादक सिर्फ़ raw-material देने वाला न रहे, बल्कि procurement-processing-marketing chain में cooperative ownership का हिस्सा बने।
1966 के बाद संस्थाएं तो हरियाणा की बन गईं, पर शुरुआती वर्षों में कानूनी ढांचा पंजाब के पुराने कानून से ही चलता रहा। बड़ा बदलाव Haryana Cooperative Societies Act, 1984 और उसके बाद बने Haryana Cooperative Societies Rules, 1989 से आया — यहीं से रजिस्ट्रेशन, सदस्यता, प्रबंधन, ऑडिट, विवाद और समिति-कार्यकाल तक का राज्य-विशिष्ट सांविधिक ढांचा मिला। (इस Act-Rules ढांचे की पूरी संरचना अलग विस्तृत गाइड में है।)
1980 के दशक तक हरियाणा में लगभग सभी प्रमुख cooperative sectors के institutional structures बन चुके थे। इसके बाद का दौर किसी नई apex federation के गठन से ज़्यादा existing systems के consolidation और restructuring का रहा — जैसे HSCARDB की 87 primary banks को 2008 में 19 ज़िला बैंकों में समाहित करना। यहीं से एक पुरानी बहस भी अहम होती गई — किसी cooperative की सफलता उसकी membership व geographic reach से मापी जाए, या उसकी financial health, governance और service quality से?
6 जुलाई 2021 को भारत सरकार ने अलग Ministry of Cooperation बनाई, ताकि सहकारी आंदोलन के लिए अलग प्रशासनिक-कानूनी-नीतिगत ढांचा तैयार हो और grassroots cooperatives मज़बूत हों। इसके बाद PACS computerisation, Model Bye-laws, Common Service Centres, Jan Aushadhi, grain storage और business diversification जैसी पहलें राष्ट्रीय एजेंडे में तेज़ी से सामने आईं, और 2025 में National Cooperation Policy लॉन्च हुई, जिसमें दस वर्षों के लिए छह रणनीतिक स्तंभ और राज्यों को अपनी नीति फिर से तैयार करने की दिशा दी गई।
इसी दौर में CM-PACS (Comprehensive Multi-Purpose Activities Cooperative Society) हरियाणा का नया प्रयोग बनकर उभरा — जो पारंपरिक PACS से क़ानूनी व संस्थागत रूप से अलग है (यह अंतर CM-PACS क्या है में विस्तार से समझाया गया है)। PACS का digitisation भी e-PACS/ERP सिस्टम की तरफ़ बढ़ा है, और PACS अब सिर्फ़ credit तक सीमित न रहकर Common Service Centre, Jan Aushadhi केंद्र और अन्न-भंडारण जैसी सेवाओं का केंद्र भी बनती जा रही हैं (गोदाम योजना की पूरी जानकारी यहाँ है)।
⚠️ PACS की profitability एक स्थायी चुनौती रही है — विभिन्न सरकारी समीक्षाओं में यह लगातार सामने आता रहा है कि राज्य की बड़ी संख्या में PACS या तो घाटे में हैं या मुश्किल से टिकी हैं। नवीनतम आंकड़ों के लिए हरियाणा सहकारिता विभाग या PRS Legislative Research के बजट विश्लेषण देखें, क्योंकि यह संख्या समय के साथ बदलती रहती है।
1966 में प्राथमिक ज़रूरत institutional network बनाने की थी — बैंक चाहिए था, marketing federation चाहिए थी, sugar federation चाहिए थी। 2026 तक इनमें से ज़्यादातर ढांचे पहले से मौजूद हैं, और अब सरकारी समीक्षाओं में बार-बार दिखने वाले शब्द हैं — profitability, computerisation, business diversification, financial health। यानी अगली चुनौती अब भौगोलिक विस्तार नहीं, संस्थागत गुणवत्ता है।
💡 यही बात किसी भी PACS, CM-PACS या CMS के लिए भी उतनी ही सच है जितनी राज्य-स्तर की बड़ी संस्थाओं के लिए — ढांचा बनाना पहला चरण था; अब उसे आर्थिक रूप से सक्षम, पेशेवर और सदस्य-केंद्रित बनाना अगला चरण है।
अगर पूरे आठ दशक को एक वाक्य में कहें, तो — पहले संस्थाएँ बनीं (1966 के आसपास), फिर कानूनी ढाँचा अपना हुआ (1984/1989), और अब गुणवत्ता व डिजिटलीकरण का दौर है (2021 के बाद)। हर चरण की अपनी ज़रूरत थी, और हर चरण अगले की नींव बना। आज की PACS, CM-PACS या HAFED इसी क्रमिक विकास का परिणाम हैं — कोई भी संस्था शून्य से नहीं, बल्कि इस लंबे संस्थागत सफ़र से आई है। इसीलिए वर्तमान को समझने के लिए इतिहास जानना उपयोगी है — यह बताता है कि आज की व्यवस्थाएँ क्यों जैसी हैं, वैसी हैं।
हरियाणा में सहकारिता का इतिहास कब से माना जाता है? — वर्तमान हरियाणा क्षेत्र में cooperative movement आज़ादी से पहले भी मौजूद था, पर अलग हरियाणा राज्य की cooperative institutional संरचना मुख्यतः 1 नवंबर 1966 के बाद विकसित हुई। हरियाणा का प्रमुख सहकारी क़ानून कौन-सा है? — Haryana Cooperative Societies Act, 1984, साथ में Haryana Cooperative Societies Rules, 1989। HAFED की स्थापना कब हुई? — हरियाणा राज्य बनने के साथ ही, 1 नवंबर 1966 को। CM-PACS और PACS क्या एक ही हैं? — नहीं; CM-PACS (Comprehensive Multi-Purpose Activities Cooperative Society) को PACS (Primary Agricultural Credit Society) से क़ानूनी व संस्थागत रूप से अलग समझना चाहिए। हरियाणा में कितनी PACS हैं? — अलग-अलग सरकारी दस्तावेज़ों में classification व reference-date के अनुसार अलग आंकड़े मिलते हैं; इसलिए "कुल PACS", "PACS/PCCS/FSS" और "computerisation में शामिल PACS" को अलग-अलग पढ़ना ज़रूरी है।
जुड़ी पढ़ाई: CM-PACS क्या है · हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम 1984 व नियम 1989 गाइड · NDDB क्या है
जुड़े शब्द: HARCO Bank · HAFED · HSCARDB · Sugarfed · सहकारिता मंत्रालय · CM-PACS
📘 स्रोत: संबंधित सहकारी संस्थाओं (HARCO/HAFED/HSCARDB/Sugarfed/Labourfed/HARCOFED) का आधिकारिक इतिहास, Punjab Reorganisation Act 1966, Haryana अधिनियम 1984/नियम 1989, व राष्ट्रीय घटनाक्रम (सहकारिता मंत्रालय 2021, National Cooperation Policy 2025)। PACS-संख्या स्रोत/परिभाषा-अनुसार भिन्न — हरियाणा सहकारिता विभाग/PRS से पुष्टि करें। Evidence Level A/B।
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