हरियाणा की एक सहकारी समिति ने 2014 में भर्ती निकाली, इंटरव्यू लिए और क्लर्क-कम-सेल्समैन व चौकीदार जैसे पदों पर नियुक्तियां कीं — पूरी प्रक्रिया में किसी ने भी फ़र्ज़ीवाड़े, पक्षपात या ग़लत उम्मीदवार चुने जाने का आरोप नहीं लगाया। फिर भी क़रीब 11 साल बाद इन कर्मचारियों की नौकरी सिर्फ़ इसलिए छीन ली गई क्योंकि जिस बोर्ड बैठक में नियुक्ति को मंज़ूरी मिली थी, उसमें तीन ज़रूरी सरकारी अधिकारी मौजूद नहीं थे। सुप्रीम कोर्ट ने Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors. (2026 INSC 641) मामले में इस पूरे विवाद को पलटते हुए एक बेहद अहम सिद्धांत तय किया — अधिकारियों की ग़लती की सज़ा कर्मचारियों को नहीं मिलनी चाहिए। यह फ़ैसला हरियाणा की किसी भी सहकारी समिति — PACS, CM-PACS या मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी — में नियुक्ति व सेवा-विवाद पर सीधा असर डालता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| केस | Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors., 2026 INSC 641 |
| कोर्ट व तारीख़ | सुप्रीम कोर्ट, 11 जून 2026 |
| बेंच | जस्टिस संजय करोल व जस्टिस नोंगमेइकापम कोतिस्वर सिंह |
| संस्था | थानेसर कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी लिमिटेड, कुरुक्षेत्र |
| मूल गड़बड़ी | 13 अगस्त 2014 की बोर्ड बैठक में तीन अनिवार्य अधिकारी (सहायक रजिस्ट्रार, इंस्पेक्टर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़, DM हैफेड) मौजूद नहीं थे — Rule 3 का उल्लंघन |
| पहले क्या हुआ | रजिस्ट्रार से हाईकोर्ट तक — सभी ने नियुक्तियां रद्द कर दीं |
| सुप्रीम कोर्ट ने क्या बदला | विज्ञापन व इंटरव्यू में कोई खामी नहीं थी, इसलिए सिर्फ़ मंज़ूरी-चरण की चूक पूरी भर्ती रद्द करने का आधार नहीं बन सकती |
थानेसर कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी, कुरुक्षेत्र ने 2014 में क्लर्क-कम-सेल्समैन व प्यून-कम-चौकीदार के कुछ पदों के लिए भर्ती निकाली — विज्ञापन सही तरीक़े से प्रकाशित हुआ, 21 दिन का समय दिया गया, इंटरव्यू हुए, और चयन प्रक्रिया में किसी तरह की धांधली, पक्षपात या अयोग्य उम्मीदवार के चयन का कोई आरोप नहीं था। 13 अगस्त 2014 को बोर्ड ने इन नियुक्तियों को मंज़ूरी दी।
समस्या यहीं से शुरू हुई: Primary Cooperative Marketing-cum-Processing Societies Ltd. Staff Service Rules, 2003 के Rule 3 के तहत ऐसी किसी भी नियुक्ति को मंज़ूरी देने वाली बोर्ड बैठक में तीन अधिकारियों — सहायक रजिस्ट्रार, इंस्पेक्टर कोऑपरेटिव सोसाइटीज़ और डिस्ट्रिक्ट मैनेजर हैफेड — का मौजूद रहना अनिवार्य था। 13 अगस्त 2014 की बैठक में ये तीनों अधिकारी मौजूद नहीं थे।
कुछ सदस्यों ने Haryana Co-operative Societies Act, 1984 के तहत रजिस्ट्रार के सामने नियुक्तियों को चुनौती दी — Additional Registrar ने Rule 3 के उल्लंघन के आधार पर नियुक्तियां रद्द कीं, Additional Chief Secretary (अपील) ने रद्दीकरण बरक़रार रखा, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की सिंगल जज बेंच ने नियुक्तियों को शून्य मानते हुए रद्दीकरण बरक़रार रखा, और डिवीज़न बेंच ने भी 29 जुलाई 2025 के आदेश में इसकी पुष्टि की। 19 अगस्त 2025 को क़रीब 11 साल की सेवा के बाद कर्मचारियों की सेवा समाप्त कर दी गई।
⚠️ यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि भर्ती की वैधता पर कभी सवाल नहीं उठा — पूरा विवाद सिर्फ़ बोर्ड-बैठक की एक प्रक्रियागत शर्त पूरी न होने पर था, फिर भी शुरुआती हर स्तर पर नियुक्तियां रद्द होती रहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्र रूप से (holistically) देखने का सिद्धांत अपनाया, और तीन चरणों में बांटा:
कोर्ट ने साफ़ कहा कि हर प्रक्रियागत खामी भर्ती को रद्द करने के लिए काफ़ी नहीं होती, और दो तरह की खामियों में फ़र्क़ किया:
📘 मूल/जड़ तक जाने वाली खामियां (fundamental defects) — जैसे विज्ञापन ही न निकालना, बराबरी का मौक़ा न देना, या धोखाधड़ी — पूरी भर्ती को अमान्य कर सकती हैं। सुधार योग्य खामियां (curable defects) — जैसे चयन के बाद, मंज़ूरी की प्रक्रिया में कोई पर्यवेक्षी चूक — भर्ती की नींव को प्रभावित नहीं करतीं और इन्हें सुधारा जा सकता है।
कोर्ट के फ़ैसले का सबसे ज़्यादा उद्धृत हिस्सा (पैराग्राफ़ 59 से): "We find force in the submission made on behalf of Appellants that for the irregularity committed by the officials, the Appellants ought not be made to suffer, as no allegations had been made as regards the validity of advertisement or the manner in which interview was conducted or that any ineligible candidates were recommended/appointed."
आम भाषा में इस फ़ैसले का मतलब है — जिसकी ग़लती, उसकी ज़िम्मेदारी। अगर अधिकारी अपनी ड्यूटी (बैठक में उपस्थिति) निभाने में चूके, तो इसका दंड उन निर्दोष कर्मचारियों को नहीं मिलना चाहिए जिन्हें एक निष्पक्ष प्रक्रिया से चुना गया था। कोर्ट ने न्याय के इसी बुनियादी सिद्धांत को लागू किया — कि किसी को दूसरे की गलती की सज़ा नहीं दी जा सकती, ख़ासकर तब जब उसने ख़ुद कोई गड़बड़ी नहीं की। यही इस फ़ैसले को इतना अहम व व्यापक बनाता है।
कोर्ट ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का 29 जुलाई 2025 का आदेश रद्द करते हुए सोसाइटी को निर्देश दिया कि वह तीनों अनिवार्य अधिकारियों की मौजूदगी में बोर्ड बैठक फिर से बुलाए। यह पुनर्विचार सिर्फ़ इस बात तक सीमित रहेगा कि उम्मीदवार योग्य थे या नहीं और चयन समिति की सिफ़ारिश वैध थी या नहीं — विज्ञापन या इंटरव्यू की वैधता पर दोबारा सवाल नहीं उठाया जा सकता। यह प्रक्रिया एक महीने में पूरी करनी थी। अगर बोर्ड दोबारा मंज़ूरी देता है, तो कर्मचारियों को बहाल किया जाएगा और पुरानी सेवा आगे के लाभों के लिए गिनी जाएगी — पर बीच की अवधि का एरियर नहीं मिलेगा।
थानेसर सोसाइटी पर Primary Cooperative Marketing-cum-Processing Societies Ltd. Staff Service Rules, 2003 लागू होते हैं, जबकि PACS पर अलग PACS Service Rules लागू होते हैं (इनकी पूरी तुलना यहाँ है)। इसलिए क्लॉज़-दर-क्लॉज़ यह मान लेना ग़लत होगा कि यह फ़ैसला सभी संस्थाओं पर हूबहू लागू होगा।
फिर भी, इसका असली महत्व एक सामान्य सिद्धांत में है, जो Haryana Co-operative Societies Act, 1984 के तहत बनी लगभग हर सहकारी संस्था — PACS, CM-PACS, दुग्ध समिति, मार्केटिंग सोसाइटी — पर लागू होता है: सोसाइटी व सरकारी पर्यवेक्षी तंत्र (Registrar/Assistant Registrar) की प्रक्रियागत चूक, अकेले इस आधार पर, किसी निष्पक्ष तरीक़े से चुने गए कर्मचारी की नौकरी छीनने का आधार नहीं बन सकती — जब तक भर्ती की बुनियाद (विज्ञापन, समान अवसर, चयन की निष्पक्षता) पर सवाल न हो।
💡 यह मामला रजिस्ट्रार-केंद्रित विवाद-निपटान तंत्र से होकर ही गुज़रा — पहले Additional Registrar, फिर अपील में Additional Chief Secretary — जो Act की Section 102 की उसी व्यवस्था को दिखाता है जिसकी चर्चा PACS Service Rules से जुड़े लेख में विस्तार से की गई है। साथ ही, सहकारी समिति को Article 12 के तहत "State" न मानने से जुड़े सवाल पर अलग विस्तृत लेख पहले से मौजूद है।
उम्मीदवार/कर्मचारी के लिए: अगर आपकी नियुक्ति सही विज्ञापन व निष्पक्ष इंटरव्यू के बाद हुई थी, पर बाद में किसी प्रशासनिक/मंज़ूरी संबंधी खामी के आधार पर रद्द की गई, तो यह फ़ैसला एक मज़बूत मिसाल बनता है — गारंटी नहीं, पर तर्क का ठोस आधार।
सोसाइटी की प्रबंध समिति/बोर्ड के लिए: नियम में तय अनिवार्य अधिकारियों की मौजूदगी को हल्के में न लें — यह चूक पूरी भर्ती को कानूनी विवाद में डाल सकती है, भले ही भर्ती अपने आप में पूरी तरह निष्पक्ष क्यों न हो। हर मंज़ूरी बैठक में ज़रूरी अधिकारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करें और उसका रिकॉर्ड रखें।
Registrar/सहायक रजिस्ट्रार जैसे अधिकारियों के लिए: यह फ़ैसला परोक्ष रूप से यह भी कहता है कि पर्यवेक्षी तंत्र की अपनी ग़ैर-मौजूदगी के लिए कर्मचारियों को दंडित करना अदालत में नहीं टिकता — इसलिए मंज़ूरी प्रक्रिया में अधिकारियों की समय पर भागीदारी उतनी ही ज़रूरी है।
⚠️ यह याद रखना ज़रूरी है कि यह लेख कानूनी सलाह नहीं है। अगर आपकी नियुक्ति किसी प्रक्रियागत खामी के आधार पर रद्द हुई है, तो पहले यह जांचें कि खामी विज्ञापन/चयन चरण में थी या सिर्फ़ मंज़ूरी चरण में — यही फ़र्क़ इस फ़ैसले के लागू होने की कुंजी है — और किसी विशिष्ट मामले में मूल आदेश व किसी योग्य वकील की सलाह ज़रूर लें।
इस पूरे मामले से एक व्यावहारिक सबक़ हर समिति के लिए निकलता है — सही रिकॉर्ड ही सबसे बड़ी सुरक्षा है। अगर बोर्ड बैठक में अनिवार्य अधिकारियों की उपस्थिति (या उनकी विधिवत सूचना) का रिकॉर्ड सही होता, तो शायद यह पूरा 11-साल लंबा विवाद ही न खड़ा होता। इसलिए हर भर्ती-मंज़ूरी बैठक में — उपस्थिति, quorum, अनिवार्य अधिकारियों की मौजूदगी, और पूरी प्रक्रिया — सब कुछ स्पष्ट व प्रमाणित रूप से दर्ज करें। यही अनुशासन भविष्य के कानूनी जोखिम से समिति व उसके कर्मचारियों, दोनों को बचाता है। (देखें: Board Resolution गाइड।)
Gaurav Mehla केस किस बारे में है? — सुप्रीम कोर्ट का 2026 का फ़ैसला, जिसमें कहा गया कि सिर्फ़ बोर्ड बैठक में अनिवार्य अधिकारियों की ग़ैर-मौजूदगी की वजह से — जब विज्ञापन व चयन प्रक्रिया निष्पक्ष थी — पूरी भर्ती रद्द नहीं की जा सकती। क्या यह फ़ैसला PACS पर भी लागू होता है? — सीधे तौर पर यह मार्केटिंग-कम-प्रोसेसिंग सोसाइटी के अपने Staff Service Rules, 2003 पर आधारित है; PACS Service Rules अलग दस्तावेज़ हैं। पर इसका सामान्य सिद्धांत — प्रशासनिक चूक की सज़ा कर्मचारी को नहीं — किसी भी हरियाणा कोऑपरेटिव सोसाइटी के मामले में तर्क के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है। "fundamental defect" और "curable defect" में क्या फ़र्क़ है? — Fundamental defect भर्ती की बुनियाद को प्रभावित करता है (जैसे विज्ञापन न होना, धोखाधड़ी) और पूरी भर्ती रद्द कर सकता है। Curable defect बाद के प्रशासनिक चरण की चूक है (जैसे मंज़ूरी बैठक में अधिकारी की ग़ैर-मौजूदगी), जिसे सुधारा जा सकता है। क्या इससे नियुक्तियां अपने-आप बहाल हो गईं? — नहीं। कोर्ट ने बहाली नहीं की, बल्कि सोसाइटी को एक महीने में सही अधिकारियों की मौजूदगी में दोबारा विचार करने का निर्देश दिया। इस फ़ैसले का मूल सिद्धांत क्या है? — "जिसकी ग़लती, उसकी ज़िम्मेदारी" — अधिकारियों की प्रक्रियागत चूक की सज़ा निर्दोष, निष्पक्ष रूप से चुने गए कर्मचारी को नहीं दी जा सकती। समिति-बोर्ड के लिए मुख्य सबक़ क्या है? — हर भर्ती-मंज़ूरी बैठक में अनिवार्य अधिकारियों की उपस्थिति व पूरी प्रक्रिया का स्पष्ट, प्रमाणित रिकॉर्ड रखें।
Gaurav Mehla फ़ैसला सहकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत व एक स्पष्ट सिद्धांत है — निष्पक्ष रूप से चुने गए कर्मचारी को अधिकारियों की प्रक्रियागत चूक की सज़ा नहीं मिल सकती। इसकी सबसे बड़ी सीख "fundamental" व "curable" खामी के फ़र्क़ में है: भर्ती की बुनियाद में गड़बड़ी (विज्ञापन/चयन/धोखाधड़ी) पूरी भर्ती गिरा सकती है, पर बाद के प्रशासनिक चरण की सुधार-योग्य चूक नहीं। समिति के बोर्ड के लिए इसका सीधा संदेश है — हर मंज़ूरी बैठक में अनिवार्य अधिकारियों की उपस्थिति व पूरा रिकॉर्ड सुनिश्चित करें, ताकि एक निष्पक्ष भर्ती भी किसी तकनीकी चूक के कारण सालों के विवाद में न फँसे। और कर्मचारी के लिए — अपने मामले में खामी की प्रकृति पहचानें व मूल आदेश/वकील की सलाह ज़रूर लें।
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जुड़े शब्द: fundamental defect · curable defect · Staff Service Rules · Rule 3 · भर्ती-मंज़ूरी
📘 नोट: यह सामान्य कानूनी जानकारी है, Gaurav Mehla & Ors. v. State of Haryana & Ors. (2026 INSC 641; सुप्रीम कोर्ट, 11 जून 2026) व संबंधित नियमों (Primary Cooperative Marketing-cum-Processing Societies Ltd. Staff Service Rules 2003, Rule 3) पर आधारित। कानूनी व्याख्या तथ्यों व लागू नियमों पर निर्भर करती है — विशिष्ट मामले में मूल आदेश व योग्य वकील की सलाह लें। Evidence Level A (शैक्षिक)।
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