एक धारणा अक्सर सुनने को मिलती है — चूँकि सहकारी समिति किसी सहकारी अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड है, रजिस्ट्रार उसकी निगरानी करता है, और वह अक्सर सरकारी योजनाओं से जुड़ी होती है, इसलिए वह किसी न किसी रूप में "सरकारी संस्था" ही है — और उसके ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में सीधे रिट याचिका (writ petition) दाख़िल की जा सकती है। Punjab & Haryana High Court के एक हालिया फ़ैसले ने इस धारणा को कानूनी कसौटी पर फिर परखा है, और नतीजा उतना सीधा नहीं जितना लगता है।
Multan Singh v. State of Haryana and Others (CWP-7283-2023) में एक कर्मचारी ने The Pundri Cooperative Marketing-cum-Processing Society Ltd. के ख़िलाफ़ रिटायरमेंट बेनिफिट्स में देरी पर ब्याज़ माँगते हुए Article 226 के तहत याचिका दाख़िल की थी। सोसाइटी ने शुरुआत में ही एक थ्रेशहोल्ड आपत्ति उठाई: क्या हाई कोर्ट सिर्फ़ इसलिए इस सोसाइटी के ख़िलाफ़ रिट सुन सकता है क्योंकि वह हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम के तहत रजिस्टर्ड है?
30 जनवरी 2026 को Justice Harpreet Singh Brar ने याचिका को इसी आधार पर ख़ारिज कर दिया — याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाया कि सोसाइटी सरकार की "instrumentality" थी या कोई ऐसा सार्वजनिक/वैधानिक दायित्व (public/statutory duty) निभा रही थी जिससे रिट क्षेत्राधिकार लागू हो।
⚠️ यहाँ एक ज़रूरी बात साफ़ समझ लें: कोर्ट ने ब्याज़ के दावे के गुण-दोष (merits) पर कोई राय नहीं दी — याचिका सिर्फ़ maintainability के आधार पर ख़ारिज हुई। यानी कर्मचारी का दावा ग़लत नहीं ठहराया गया, बस यह तय हुआ कि हाई कोर्ट की रिट इसका सही मंच नहीं थी।
आगे बढ़ने से पहले दो बुनियादी बातें। रिट (writ) हाई कोर्ट/सुप्रीम कोर्ट का एक शक्तिशाली आदेश है, जो किसी को कुछ करने/न करने को कहता है (जैसे mandamus — कर्तव्य निभाने का आदेश)। Article 226 संविधान का वह प्रावधान है जो हाई कोर्ट को ऐसे रिट जारी करने की शक्ति देता है — मुख्यतः "State" या सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली संस्थाओं के विरुद्ध। सवाल यही है कि क्या एक सहकारी समिति इस दायरे में आती है — और इसका जवाब, जैसा नीचे देखेंगे, "हमेशा नहीं" है।
यह फ़ैसला Supreme Court के स्थापित सिद्धांतों पर आधारित है। Pradeep Kumar Biswas v. Indian Institute of Chemical Biology (2002) में कोर्ट ने कहा था कि किसी संस्था को Article 12 के तहत "State" मानने के लिए उसकी legal form नहीं, बल्कि यह देखना होगा कि सरकार का उस पर financial, functional और administrative domination है या नहीं — और यह नियंत्रण सामान्य रेगुलेटरी निगरानी से कहीं ज़्यादा, संस्था-विशिष्ट और व्यापक (pervasive) होना चाहिए।
इसी तर्क को General Manager, Kisan Sahkari Chini Mills Ltd. v. Satrughan Nishad (2003) 8 SCC 639 में एक सहकारी चीनी मिल पर लागू किया गया था — वहाँ राज्य सरकार की बड़ी शेयरहोल्डिंग और मैनेजमेंट में प्रतिनिधित्व के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह अकेला तथ्य निर्णायक नहीं है। असली सवाल है: फंडिंग कहाँ से आती है, प्रशासनिक नियंत्रण कितना वास्तविक है, कारोबार की प्रकृति क्या है।
Punjab & Haryana High Court ख़ुद भी यह सिद्धांत क़रीब 45 साल पहले Pritam Singh Gill v. State of Punjab (AIR 1982 P&H 228) में स्वीकार कर चुकी है — जहाँ Full Bench ने कहा था कि रजिस्ट्रेशन अकेला रिट से बचाव नहीं देता, लेकिन रजिस्ट्रेशन अकेला रिट के लिए पर्याप्त भी नहीं है। सब कुछ तथ्यों पर निर्भर करता है।
एक ज़रूरी भेद यहाँ समझना ज़रूरी है। Article 12 यह तय करता है कि कोई संस्था मौलिक अधिकारों के संदर्भ में "State" मानी जाएगी या नहीं। लेकिन Article 226 की भाषा ज़्यादा व्यापक है — हाई कोर्ट कुछ हालात में ऐसी private body के ख़िलाफ़ भी mandamus जारी कर सकता है जो Article 12 की "State" न हो, बशर्ते वह कोई सार्वजनिक/वैधानिक ड्यूटी निभा रही हो और चुनौती दी जा रही कार्रवाई का उस ड्यूटी से सीधा संबंध हो।
Supreme Court ने St. Mary's Education Society v. Rajendra Prasad Bhargava (2022) में यह साफ़ किया कि कोई private institution सार्वजनिक कार्य कर सकती है, पर इसका मतलब यह नहीं कि उसके हर आंतरिक फ़ैसले पर Article 226 लागू हो जाएगा — शुद्ध रूप से निजी अनुबंध-संबंधी विवाद (जिसमें statutory backing नहीं है) आमतौर पर रिट क्षेत्राधिकार में नहीं आता।
Multan Singh जजमेंट कोई ब्लैंकेट नियम नहीं बनाता कि "हरियाणा की सभी सहकारी समितियाँ अब रिट क्षेत्राधिकार से बाहर हैं"। कोर्ट ने सिर्फ़ स्थापित टेस्ट दोहराया है — हर संस्था को उसके तथ्यात्मक चरित्र पर परखा जाएगा। किसी दूसरी संस्था में अगर सरकार पर्याप्त व्यय वहन करती हो, बोर्ड के प्रमुख पद सरकारी नामितों के नियंत्रण में हों, बड़े वित्तीय/प्रशासनिक फ़ैसले सरकारी मंज़ूरी पर निर्भर हों, या संस्था कोई एकाधिकार-जैसी वैधानिक भूमिका निभा रही हो — तो नतीजा अलग हो सकता है।
📘 कोर्ट ने साफ़ लिखा कि सोसाइटी की यह दलील — कि उसके वित्तीय/प्रशासनिक मामलों पर सरकार का नियंत्रण नहीं है — याचिकाकर्ता की ओर से प्रभावी रूप से unchallenged रही। यानी सिर्फ़ यह लिख देना काफ़ी नहीं कि "समिति सरकार के नियंत्रण में है" — इसे दस्तावेज़ों से साबित करना होगा।
इन सभी फ़ैसलों का साझा सूत्र एक बारीक फ़र्क़ है — नियंत्रण (control) बनाम निगरानी (supervision)। रजिस्ट्रार द्वारा ऑडिट कराना, उपनियम मंज़ूर करना या चुनाव कराना "निगरानी" है — यह हर सहकारी समिति पर लागू होती है, पर इससे समिति "सरकारी" नहीं बन जाती। "नियंत्रण" तब माना जाता है जब सरकार का समिति के रोज़मर्रा प्रबंधन, वित्त व फ़ैसलों पर गहरा, व्यापक दख़ल हो। चूँकि अधिकांश समितियों का प्रबंधन उनके सदस्यों की चुनी प्रबंध समिति करती है, वे "निगरानी" के दायरे में रहती हैं, "नियंत्रण" के नहीं — और इसीलिए आम तौर पर रिट क्षेत्राधिकार में नहीं आतीं। (यही सिद्धांत RTI पर भी लागू होता है — देखें: RTI व सहकारी समितियाँ।)
अगर किसी कर्मचारी की सेवा-शर्तें किसी वैधानिक प्रावधान से गवर्न नहीं होतीं और नियोक्ता समिति Article 12 की "State" नहीं है, तो सिर्फ़ वेतन, रिटायरमेंट देय राशि, प्रमोशन या सेवा-अनुबंध से जुड़ा विवाद Article 226 में ले जाना maintainability आपत्ति का सामना कर सकता है। इसका मतलब यह नहीं कि कर्मचारी के पास कोई उपाय नहीं — उपलब्ध रास्ता विवाद की प्रकृति पर निर्भर करेगा: लागू सेवा नियम, रोज़गार अनुबंध, श्रम कानून, या कोई विशेष वैधानिक तंत्र।
यहाँ एक अहम बारीकी है: हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम की धारा 102 आमतौर पर समिति के गठन, प्रबंधन या कारोबार से जुड़े विवादों को रजिस्ट्रार के मध्यस्थता-तंत्र में भेजती है (देखें: समिति में विवाद कहाँ जाएँ), लेकिन इसी प्रावधान में paid servant के अनुशासनात्मक कार्रवाई और सेवा-मामलों को स्पष्ट रूप से बाहर रखा गया है। इसलिए कर्मचारी यह मानकर न चलें कि हर सेवा-विवाद अपने आप धारा 102 मध्यस्थता में चला जाएगा — सही मंच की पहचान पहले करनी होगी।
सदस्यों (कर्मचारियों से अलग) के मामलों में स्थिति भिन्न है — धारा 102 सदस्य, पूर्व सदस्य, समिति व प्रबंध समिति के बीच के कई विवादों को रजिस्ट्रार-मध्यस्थता के दायरे में लाती है, इसलिए सदस्य को सीधे हाई कोर्ट जाने से पहले यह देखना होगा कि अधिनियम ने उस विवाद के लिए पहले से कोई विशेष उपाय दिया है या नहीं।
तो एक आम सदस्य/कर्मचारी को क्या करना चाहिए? सबसे पहले यह पहचानें कि आपका विवाद किस श्रेणी का है — सदस्य-संबंधी (शेयर/चुनाव/बकाया), सेवा-संबंधी (वेतन/प्रमोशन), या संवैधानिक-अधिकार का। फिर देखें कि अधिनियम ने उसके लिए कोई विशेष उपाय (जैसे धारा 96 मध्यस्थता) दिया है या नहीं — अगर हाँ, तो पहले वही रास्ता अपनाना होगा। सीधे हाई कोर्ट रिट तभी टिकती है जब या तो समिति सचमुच सरकार की instrumentality हो, या वह कोई सार्वजनिक/वैधानिक कर्तव्य निभा रही हो जिससे विवाद सीधे जुड़ा हो। इसलिए रिट दाख़िल करने से पहले किसी क़ानूनी विशेषज्ञ से यह ज़रूर परखवाएँ कि आपका मामला maintainability की कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं — वरना दावा सही होते हुए भी सिर्फ़ मंच-गलती के कारण ख़ारिज हो सकता है।
एक ग़लतफ़हमी से बचें — इस तरह के फ़ैसले न तो सदस्य/कर्मचारी के दावे को "गलत" ठहराते हैं, न ही समिति को "जवाबदेही से मुक्त" करते हैं। ये सिर्फ़ यह तय करते हैं कि कौन-सा मंच सही है। समिति अब भी अपने सदस्यों/कर्मचारियों के प्रति अपने दायित्व निभाने को बाध्य है, और उनके पास उपयुक्त मंचों (मध्यस्थता, सेवा-नियम, श्रम कानून, या उपयुक्त स्थिति में हाई कोर्ट) के ज़रिए उपाय उपलब्ध हैं। यानी यह "न्याय से इनकार" नहीं, बल्कि "सही दरवाज़े" की ओर संकेत है। सही मंच पर जाने से मामला तेज़ी से व प्रभावी ढंग से सुना जाता है।
क्या सहकारी समिति के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर की जा सकती है? — हमेशा नहीं; यह इस पर निर्भर करता है कि सरकार का उस पर वास्तविक वित्तीय/प्रशासनिक नियंत्रण है या समिति कोई सार्वजनिक/वैधानिक ड्यूटी निभा रही है। क्या Multan Singh फ़ैसले ने रजिस्ट्रार की शक्तियाँ कम कर दीं? — नहीं। यह फ़ैसला सिर्फ़ Article 12/226 के दायरे पर है; रजिस्ट्रेशन, ऑडिट, चुनाव जैसी रजिस्ट्रार की वैधानिक शक्तियाँ अधिनियम से अलग बनी रहती हैं। कर्मचारी के सेवा-विवाद के लिए कौन-सा मंच सही है? — यह लागू सेवा नियम, अनुबंध और विवाद की प्रकृति पर निर्भर करता है; धारा 102 मध्यस्थता में paid servant के सेवा-मामले शामिल नहीं हैं। क्या यह फ़ैसला पूरे देश पर लागू है? — नहीं, यह Punjab & Haryana High Court के एक Single Judge का फ़ैसला है, सुप्रीम कोर्ट का सर्वोच्च निर्णय नहीं — पर यह पहले से स्थापित सिद्धांतों को ही लागू करता है। Article 12 और Article 226 में क्या फ़र्क़? — Article 12 "State" की परिभाषा (मौलिक अधिकारों हेतु); Article 226 हाई कोर्ट की व्यापक रिट-शक्ति, जो कुछ हालात में सार्वजनिक-कर्तव्य वाली निजी संस्था पर भी लागू। "नियंत्रण" व "निगरानी" में क्या अंतर है? — प्रबंधन/वित्त पर गहरा दख़ल = नियंत्रण (रिट संभव); सिर्फ़ ऑडिट/चुनाव/उपनियम-मंज़ूरी = निगरानी (आम तौर पर रिट नहीं)। रिट दाख़िल करने से पहले क्या करें? — विवाद की श्रेणी पहचानें, अधिनियम का विशेष उपाय देखें, व maintainability किसी विशेषज्ञ से परखवाएँ।
इस पूरे विषय का सार एक वाक्य में — "सहकारी समिति रजिस्टर्ड है" का मतलब यह नहीं कि उसके हर विवाद पर सीधे हाई कोर्ट रिट चलेगी। अदालतों ने बार-बार यही सिद्धांत दोहराया है: असली कसौटी संस्था का रूप नहीं, बल्कि सरकार का उस पर वास्तविक नियंत्रण या उसका सार्वजनिक/वैधानिक कर्तव्य है। एक सदस्य या कर्मचारी के लिए इसका व्यावहारिक सबक़ यही है — दावा चाहे कितना भी सही हो, पहले सही मंच पहचानना ज़रूरी है, वरना मामला merits पर सुने बिना ही ख़ारिज हो सकता है। इसलिए क़ानूनी कदम उठाने से पहले विवाद की प्रकृति व सही रास्ता किसी विशेषज्ञ से ज़रूर परखवाएँ।
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जुड़े शब्द: रिट याचिका · Article 226 · Article 12 · instrumentality · maintainability
📘 नोट: यह सामान्य कानूनी जानकारी है, उद्धृत निर्णयों पर आधारित — Multan Singh v. State of Haryana (CWP-7283-2023), Pradeep Kumar Biswas (2002), Kisan Sahkari Chini Mills v. Satrughan Nishad (2003) 8 SCC 639, Pritam Singh Gill (AIR 1982 P&H 228), St. Mary's Education Society (2022)। कानूनी व्याख्या तथ्यों व अदालती निर्णयों पर निर्भर करती है — किसी विशिष्ट मामले में क़ानूनी विशेषज्ञ से सलाह लें। Evidence Level A (शैक्षिक)।
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