"समिति चलाने वाले कौन तय करते हैं?" — इसका जवाब है चुनाव। सहकारी समिति की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उसे चलाने वाले सदस्य ख़ुद, लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनते हैं। यह लेख आसान भाषा में समझाता है कि यह प्रक्रिया कैसे काम करती है।
कंपनी में जितने ज़्यादा शेयर, उतने ज़्यादा वोट। सहकारी समिति में ऐसा नहीं — हर सदस्य का एक ही वोट होता है, चाहे उसने कितनी भी पूँजी लगाई हो। यही "लोगों का नियंत्रण, पैसे का नहीं" वाला मूल सिद्धांत है।
| निकाय | कौन | काम |
|---|---|---|
| आम सभा | सभी सदस्य | प्रबंध समिति चुनना, नीति व बजट मंज़ूर करना |
| प्रबंध समिति | चुने हुए सदस्य | रोज़मर्रा का संचालन |
⚠️ ध्यान दें: विवरण राज्य सहकारी अधिनियम व समिति की उपविधि (bye-laws) के अनुसार बदलते हैं। कई राज्यों में (97वें संविधान संशोधन के बाद) चुनाव राज्य सहकारी चुनाव प्राधिकरण कराता है, और कार्यकाल आम तौर पर 5 वर्ष होता है।
चुनाव, बैठकें व निर्णय रिकॉर्ड में दर्ज होने चाहिए — मतदाता सूची, कार्यवृत्त (minutes), पदाधिकारी सूची। पारदर्शी रिकॉर्ड ऑडिट व सदस्य-भरोसे दोनों के लिए ज़रूरी हैं।
सहकारी चुनाव कैसे होते हैं? — आम सभा एक सदस्य-एक वोट से प्रबंध समिति चुनती है; फिर पदाधिकारी तय होते हैं। क्या ज़्यादा शेयर से ज़्यादा वोट मिलते हैं? — नहीं, हर सदस्य का एक ही वोट। कार्यकाल कितना होता है? — आम तौर पर 5 वर्ष, पर राज्य अधिनियम/उपविधि पर निर्भर। चुनाव कौन कराता है? — कई राज्यों में राज्य सहकारी चुनाव प्राधिकरण; अन्यथा उपविधि अनुसार।
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