समिति की संपत्तियाँ — फर्नीचर, कंप्यूटर, भवन, वाहन — समय के साथ पुरानी होकर अपनी कीमत खोती हैं। इस घटती कीमत को हर साल खर्च के रूप में दिखाना ही डेप्रिसिएशन (घिसाई) है। यह सही लाभ और सही बैलेंस शीट के लिए ज़रूरी है। यह लेख डेप्रिसिएशन कैसे करें — क्यों, कौन-सा तरीका, एंट्री, उदाहरण व आम गलतियाँ — आसान भाषा में समझाता है।
अगर ₹60,000 का फर्नीचर सालों-साल ₹60,000 ही दिखता रहे, तो बैलेंस शीट झूठी हो जाती है और लाभ बढ़ा-चढ़ाकर दिखता है। हर साल थोड़ी कीमत घटाकर असली स्थिति दिखाई जाती है।
इसके पीछे एक बुनियादी लेखांकन-सोच है — मिलान सिद्धांत (matching principle): जो संपत्ति कई साल तक काम आती है, उसकी लागत भी उन्हीं सालों में बाँटकर दिखानी चाहिए, एक ही साल में नहीं। इसलिए ₹60,000 का फ़र्नीचर पूरा पहले साल "खर्च" नहीं होता, बल्कि उसकी घिसाई हर साल थोड़ी-थोड़ी खर्च के रूप में दिखती है। इससे हर साल का लाभ सही और तुलनीय रहता है। अगर पूरी लागत पहले साल खर्च कर दें, तो उस साल का लाभ अनुचित रूप से कम और बाकी सालों का ज़्यादा दिखेगा — जो असल तस्वीर नहीं है।
डेप्रिसिएशन उन टिकाऊ (पूँजीगत) संपत्तियों पर लगता है जो एक साल से ज़्यादा काम आती हैं — फ़र्नीचर, कंप्यूटर, वाहन, मशीनरी, भवन। ज़मीन पर आम तौर पर डेप्रिसिएशन नहीं लगता (वह घिसती नहीं), और रोज़मर्रा के खर्च (बिजली, किराया, स्टेशनरी) पर तो सवाल ही नहीं — वे पहले ही उसी साल के खर्च होते हैं। पूँजीगत व राजस्व खर्च का यह भेद ज़रूरी है। (देखें: 10 आम गलतियाँ।)
| पहलू | SLM | WDV |
|---|---|---|
| आधार | मूल लागत | बचा मूल्य |
| हर साल राशि | बराबर | घटती जाती है |
| उपयोगी | स्थिर घिसाई वाली संपत्ति (फ़र्नीचर, भवन) | तेज़ पुरानी होने वाली (कंप्यूटर, वाहन) |
💡 कौन-सा तरीका व दर — यह संपत्ति-प्रकार व लागू नियमों पर निर्भर है। इस लेख के सभी प्रतिशत केवल उदाहरण हैं; अपनी समिति पर लागू सटीक दर व तरीका अपने नियम/ऑडिटर से पक्का करें, क्योंकि ये कानून व संपत्ति-प्रकार से बदलते हैं। एक बार तरीका चुन लें, तो उसे साल-दर-साल बदलें नहीं।
डेप्रिसिएशन जिस "लागत" पर लगता है, वह सिर्फ़ खरीद-मूल्य नहीं होता — उसमें संपत्ति को उपयोग-लायक बनाने के सारे ज़रूरी खर्च जुड़ते हैं: ढुलाई, स्थापना (installation), और शुरुआती सेटअप। जैसे ₹55,000 का फ़र्नीचर + ₹5,000 ढुलाई/असेंबली = कुल लागत ₹60,000, और डेप्रिसिएशन इसी ₹60,000 पर लगेगा। इसलिए खरीद के समय इन खर्चों को अलग "खर्च" न मानकर संपत्ति की लागत में जोड़ें।
हर संपत्ति का एक अनुमानित "उपयोगी जीवन" होता है — यानी वह कितने साल काम आएगी। कंप्यूटर का जीवन कम होता है (तेज़ी से पुराना पड़ता है), जबकि भवन का जीवन बहुत ज़्यादा होता है। तरीका व दर काफ़ी हद तक इसी पर आधारित होती है: जितना कम जीवन, उतनी तेज़ घिसाई। यही कारण है कि कंप्यूटर/वाहन के लिए अक्सर WDV (तेज़) और भवन/फ़र्नीचर के लिए SLM (स्थिर) चुना जाता है।
हर साल ₹6,000 घटेगा (यहाँ 10% केवल उदाहरण-दर है):
| साल | शुरू मूल्य | डेप्रिसिएशन | बचा मूल्य |
|---|---|---|---|
| 1 | ₹60,000 | ₹6,000 | ₹54,000 |
| 2 | ₹54,000 | ₹6,000 | ₹48,000 |
| 3 | ₹48,000 | ₹6,000 | ₹42,000 |
अब वही ₹60,000 फर्नीचर WDV 10% पर देखें — हर साल बचे मूल्य पर 10%:
| साल | शुरू मूल्य | डेप्रिसिएशन (10%) | बचा मूल्य |
|---|---|---|---|
| 1 | ₹60,000 | ₹6,000 | ₹54,000 |
| 2 | ₹54,000 | ₹5,400 | ₹48,600 |
| 3 | ₹48,600 | ₹4,860 | ₹43,740 |
ध्यान दें — SLM में हर साल ₹6,000 बराबर घटा, पर WDV में राशि घटती गई (₹6,000 → ₹5,400 → ₹4,860)। यही दोनों तरीकों का मूल फर्क है।
कौन-सा कब चुनें? SLM उन संपत्तियों के लिए ठीक है जो एक-सी गति से घिसती हैं (भवन, फ़र्नीचर) — यहाँ हर साल बराबर खर्च दिखाना तर्कसंगत है। WDV उन संपत्तियों के लिए जो शुरू में तेज़ी से पुरानी होती हैं (कंप्यूटर, वाहन) — यहाँ शुरुआती सालों में ज़्यादा घिसाई दिखाना असल स्थिति के करीब है। पर सबसे ज़रूरी बात — चुनाव जो भी हो, हर संपत्ति-वर्ग के लिए एक बार तय करके उसे निरंतर रखें; बार-बार तरीका बदलना रिपोर्ट को अतुलनीय बना देता है और ऑडिट में सवाल उठाता है।
कई बार संपत्ति के जीवन-अंत पर भी थोड़ी कीमत (scrap/salvage value) बचती है — जैसे पुराना वाहन बेचने पर मिलने वाली राशि। SLM में अक्सर इसे घटाकर हिसाब लगाया जाता है: प्रति वर्ष डेप्रिसिएशन = (लागत − अवशिष्ट मूल्य) ÷ उपयोगी जीवन (वर्ष)। जैसे ₹60,000 लागत, ₹6,000 अवशिष्ट, 9 वर्ष जीवन → प्रति वर्ष (60,000 − 6,000) ÷ 9 = ₹6,000।
हर साल एक जर्नल एंट्री:
| खाता | Dr | Cr |
|---|---|---|
| डेप्रिसिएशन खर्च | ₹6,000 | — |
| संपत्ति (फर्नीचर) | — | ₹6,000 |
इससे खर्च आमदनी-खर्च खाते में जाता है, और संपत्ति की कीमत बैलेंस शीट में घटती है।
डेप्रिसिएशन एक अनोखा खर्च है, क्योंकि यह दो रिपोर्ट को एक साथ छूता है:
पर ध्यान दें — डेप्रिसिएशन में असल में नकद बाहर नहीं जाता (यह एक "गैर-नकद" खर्च है)। पैसा तो संपत्ति खरीदते समय ही गया था; डेप्रिसिएशन बस उस लागत को सालों में बाँटकर दिखाता है। इसीलिए यह रसीद-भुगतान खाते में नहीं आता, पर आमदनी-खर्च व बैलेंस शीट दोनों में दिखता है। (रिपोर्ट कैसे जुड़ती हैं: वित्तीय रिपोर्ट्स कैसे पढ़ें।)
चूँकि डेप्रिसिएशन लाभ घटाता है, यह लाभ-वितरण को भी प्रभावित करता है — सही डेप्रिसिएशन लगाए बिना निकाला गया "लाभ" फुला हुआ होता है, और उस पर बँटा डिविडेंड समिति की असली पूँजी घटा देता है। इसलिए वितरण से पहले डेप्रिसिएशन ज़रूर लगाएँ, ताकि "बाँटने लायक लाभ" वास्तविक हो। (देखें: लाभ-वितरण व आरक्षित निधि।)
🔍 "कुल डेप्रिसिएशन" (accumulated) अलग दिखाएँ तो संपत्ति का मूल लागत व अब तक की कुल घिसाई दोनों साफ़ रहते हैं।
एंट्री दो ढंग से हो सकती है:
दूसरा तरीका ज़्यादा पारदर्शी है, क्योंकि इसमें संपत्ति की मूल लागत और अब तक की कुल घिसाई — दोनों अलग-अलग साफ़ दिखती हैं। जैसे बैलेंस शीट में "फ़र्नीचर ₹60,000 (−) संचित डेप्रिसिएशन ₹18,000 = ₹42,000" लिखा दिखे, तो पढ़ने वाला तुरंत समझ जाता है कि संपत्ति कितनी पुरानी है। इसीलिए बड़ी समितियाँ अक्सर संचित-डेप्रिसिएशन तरीका ही अपनाती हैं।
हर टिकाऊ संपत्ति का अलग रिकॉर्ड रखें — खरीद-तारीख, लागत, तरीका, दर, हर साल की घिसाई व बचा मूल्य। यह "संपत्ति रजिस्टर" ऑडिट में सबसे पहले माँगा जाता है, और यही बताता है कि किस संपत्ति पर कितनी घिसाई लग चुकी है। डिजिटल सिस्टम में यह रजिस्टर व डेप्रिसिएशन-शेड्यूल अपने-आप बनते हैं, इसलिए हर संपत्ति का ब्योरा एक क्लिक पर मिलता है और साल-अंत की जर्नल एंट्री भी तैयार रहती है।
जब कोई संपत्ति बेची या हटाई जाए, तो उसकी बची किताबी कीमत (book value) से बिक्री-मूल्य की तुलना करें:
यह लाभ/हानि आमदनी-खर्च खाते में दिखता है, और संपत्ति व उसकी संचित घिसाई बहियों से हटा दी जाती है। इसे दर्ज करना ज़रूरी है, वरना बिकी हुई संपत्ति बहियों में बनी रहकर बैलेंस शीट को गलत रखती है।
उदाहरण: मान लीजिए किसी वाहन की बची किताबी कीमत ₹40,000 है और वह ₹45,000 में बिका → ₹5,000 लाभ (आय)। अगर वही ₹35,000 में बिकता → ₹5,000 हानि (खर्च)। दोनों ही स्थिति में वाहन व उसकी संचित घिसाई बहियों से हट जाती है, और नकद/बैंक बढ़ता है। यह "संपत्ति-निपटान" एंट्री ऑडिट में साफ़ दिखनी चाहिए।
डेप्रिसिएशन क्या है? — टिकाऊ संपत्ति की हर साल घटती कीमत को खर्च के रूप में दिखाना, ताकि लाभ व बैलेंस शीट सही रहें। SLM और WDV में फर्क? — SLM में हर साल बराबर राशि; WDV में बचे मूल्य पर तय %, इसलिए राशि घटती जाती है। किन संपत्तियों पर लगता है? — टिकाऊ पूँजीगत संपत्ति (फ़र्नीचर, वाहन, मशीनरी, भवन) पर; ज़मीन पर आम तौर पर नहीं। कौन-सी दर लगाएँ? — यह कानून व संपत्ति-प्रकार पर निर्भर; सटीक दर अपने नियम/ऑडिटर से पक्की करें (इस लेख के % सिर्फ़ उदाहरण हैं)। एंट्री क्या होती है? — डेप्रिसिएशन खर्च Dr, संपत्ति (या संचित डेप्रिसिएशन) Cr। डेप्रिसिएशन न लगाएँ तो? — लाभ व संपत्ति दोनों बढ़े-चढ़े दिखेंगे, और ऑडिट-आपत्ति बनेगी। संपत्ति बेचने पर क्या करें? — बची कीमत से बिक्री की तुलना कर लाभ/हानि दर्ज करें, और संपत्ति बहियों से हटाएँ। क्या डेप्रिसिएशन में नकद जाता है? — नहीं; यह गैर-नकद खर्च है, इसलिए रसीद-भुगतान में नहीं आता, पर लाभ व बैलेंस शीट को प्रभावित करता है। लागत में क्या-क्या जोड़ें? — खरीद-मूल्य के साथ ढुलाई व स्थापना जैसे ज़रूरी खर्च; इन्हें अलग खर्च न मानें। संचित डेप्रिसिएशन खाता क्या है? — संपत्ति को मूल लागत पर रखकर घिसाई अलग खाते में जोड़ना, ताकि लागत व कुल घिसाई दोनों साफ़ दिखें। वितरण से पहले डेप्रिसिएशन क्यों? — बिना डेप्रिसिएशन का लाभ फुला हुआ होता है; उस पर बँटा डिविडेंड असली पूँजी घटाता है।
डेप्रिसिएशन सही लाभ और सही बैलेंस शीट की चाबी है। हर साल वर्षांत पर लगाइए, एक ही तरीका निरंतर रखिए, हर संपत्ति का रिकॉर्ड बनाइए, और बिकी संपत्ति समय पर हटाइए। डिजिटल सिस्टम में डेप्रिसिएशन शेड्यूल अपने-आप बनता है और जर्नल एंट्री तैयार रहती है, जिससे यह काम मिनटों का रह जाता है।
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📘 यह लेख सक्रिय Knowledge Items से बना — Evidence Level A (शैक्षिक)। नोट: डेप्रिसिएशन की दरें व तरीके कानून व संपत्ति-प्रकार से बदलते हैं — लेख के सभी प्रतिशत केवल उदाहरण हैं; अपनी समिति पर लागू सटीक दर अपने नियम/ऑडिटर से पुष्टि करें।
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