PACS और कई सहकारी समितियों को सिर्फ़ अपना हिसाब ही नहीं रखना होता — उन्हें NABARD, DCCB, संघ (फेडरेशन) और सहकारी विभाग को समय-समय पर रिपोर्ट/रिटर्न भी भेजने होते हैं। पर सबसे पहले एक बड़ी ग़लतफ़हमी दूर कर लें: हर सहकारी समिति सीधे NABARD को रिटर्न नहीं देती। कौन किसे, क्या, और कब रिपोर्ट करता है — यह समझना ही आधी लड़ाई है। यह लेख इसी को उदाहरणों के साथ आसान बनाता है, ताकि आपकी समिति की रिपोर्टिंग "बोझ" नहीं, बल्कि साफ़ हिसाब का स्वाभाविक नतीजा बन जाए।
सहकारी ढाँचे में रिपोर्टिंग की दो अलग-अलग धाराएँ हैं, और दोनों को गड्डमड्ड करना सबसे आम भूल है:
उदाहरण से समझें: मान लीजिए "जय किसान PACS" अपने ज़िले के DCCB की सदस्य है। जय किसान PACS खुद NABARD को रिटर्न नहीं भेजती — वह अपना ऑडिट व वार्षिक ब्योरा रजिस्ट्रार को देती है, और अपने ऋण/जमा का लेखा-जोखा DCCB को। DCCB (जो एक सहकारी बैंक है) फिर अपने स्तर पर NABARD को OSS रिटर्न भेजता है, जिसमें उसके अधीन PACS का समेकित (consolidated) चित्र भी झलकता है।
⚠️ इसलिए "NABARD रिटर्न" मुख्यतः सहकारी बैंकों पर लागू होता है; PACS व सामान्य समिति की मूल जवाबदेही अपने रजिस्ट्रार को है। अपनी समिति पर लागू प्रारूप व due-dates हमेशा अपने सहकारी विभाग/संघ से पक्का करें।
NABARD सहकारी बैंकों का पर्यवेक्षण बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35(6) के अधिकार से करता है — इसके तहत वह StCB, DCCB और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों (RRB) का निरीक्षण करता है। यह दो तरीक़ों से होता है:
DCCB जैसी संस्थाओं की समग्र सेहत E-CAMELSC रेटिंग मॉडल पर आँकी जाती है, जो मुख्यतः इन बातों को देखता है — पूँजी-पर्याप्तता (Capital), संपत्ति-गुणवत्ता (Asset quality), प्रबंधन (Management), आय (Earnings), तरलता (Liquidity) आदि। जितनी बेहतर रेटिंग, उतनी बेहतर उधार-क्षमता व साख। (देखें: NABARD — पर्यवेक्षण प्रक्रिया)
इसका आप पर क्या असर: अगर आपकी PACS का DCCB कमज़ोर रेटिंग पाता है, तो पुनर्वित्त (refinance) व उधार महँगा या कठिन हो सकता है — और इसकी एक बड़ी वजह अक्सर नीचे PACS-स्तर पर कमज़ोर वसूली व ऊँचा NPA होता है। यानी आपका अनुशासन ऊपर तक असर डालता है।
बैंक-स्तर से अलग, हर सहकारी समिति की मूल वैधानिक जवाबदेही वार्षिक ऑडिट व रजिस्ट्रार को रिपोर्ट है:
ऑडिट व रिपोर्टिंग का सामान्य क्रम (उदाहरण):
⚠️ देरी सस्ती नहीं पड़ती: समय पर ऑडिट न होने से AGM टलती है, ग्रेडिंग गिरती है, और कई राज्यों में पदाधिकारियों पर कार्रवाई तक हो सकती है। अपने राज्य की exact धारा, प्रारूप व तिथि सहकारी विभाग से पक्की करें। (देखें: सहकारी समिति का ऑडिट कैसे होता है व ऑडिट वर्गीकरण A/B/C/D।)
चाहे रिपोर्ट रजिस्ट्रार को हो या ऊपर NABARD/संघ तक, आँकड़े अमूमन ये होते हैं — और हर एक का स्रोत आपका रोज़ का खाता है:
उदाहरण: अगर आपके सदस्य रजिस्टर में साल भर की एंट्री साफ़ है, तो "सदस्य-वृद्धि रिपोर्ट" अलग से गिनने की ज़रूरत नहीं — वह अपने-आप निकल आती है। यही बात हर आँकड़े पर लागू है।
वसूली% और NPA रिपोर्ट का आधार RBI के आय-निर्धारण व संपत्ति-वर्गीकरण (IRAC) मानदंड हैं। इन्हें उदाहरण से समझते हैं।
वसूली% कैसे निकलता है:
वसूली% = (वसूल राशि ÷ देय राशि) × 100 मान लें एक वर्ष में देय ऋण-वापसी ₹10,00,000 थी और ₹8,50,000 वसूल हुआ → वसूली% = (8,50,000 ÷ 10,00,000) × 100 = 85%।
NPA का 90-दिन नियम (worked example):
(देखें: RBI मास्टर सर्कुलर — IRAC मानदंड) यही अनुशासन आपकी वसूली% व NPA दोनों रिपोर्ट को सही रखता है। (देखें: ऋण व ब्याज लेखांकन।)
💡 व्यावहारिक टिप: NPA को साल के अंत में "खोजने" के बजाय हर महीने देखें — जैसे ही कोई किस्त 90 दिन के पास पहुँचे, वसूली-प्रयास तेज़ करें। इससे साल के अंत की रिपोर्ट और ग्रेडिंग दोनों सुधरती हैं।
रिपोर्टिंग को आसान व एक-समान बनाने के लिए सहकारिता मंत्रालय व NABARD देश की PACS को एक साझा ERP सॉफ़्टवेयर पर ला रहे हैं। इस केंद्र-प्रायोजित परियोजना को CCEA ने 29 जून 2022 को स्वीकृति दी, जिसका लक्ष्य लगभग 63,000 कार्यरत PACS का कंप्यूटरीकरण है (आरंभिक परिव्यय ₹2,516 करोड़, बाद में संशोधित)। इसका ERP हर PACS को Common Accounting System (CAS) + MIS देता है। (देखें: सहकारिता मंत्रालय — PACS कंप्यूटरीकरण)
पहले बनाम अब (उदाहरण):
💡 CAS+MIS का असली फ़ायदा यही है: रिपोर्ट "बटन दबाने जितनी" हो जाती है — अलग से जोड़-घटाव नहीं। SahakarLekha भी इसी सोच पर बना है — रोज़ का हिसाब सही, तो रिपोर्ट अपने-आप।
हर समिति का कैलेंडर अलग होगा, पर एक व्यावहारिक ढाँचा ऐसा दिख सकता है:
📌 अपनी हर रिपोर्ट व due-date को एक जगह लिख लें — बैंक हैं तो NABARD/RBI की OSS तिथियाँ, समिति हैं तो रजिस्ट्रार की ऑडिट-तिथि।
रजिस्ट्रार और (बैंकों के लिए) NABARD के अलावा, कई समितियाँ अपने संघ/फेडरेशन को भी ब्योरा देती हैं। फेडरेशन यानी वह ऊपरी सहकारी संस्था जिससे प्राथमिक समितियाँ जुड़ी होती हैं — जैसे ज़िला/राज्य सहकारी संघ, या विषय-आधारित फेडरेशन (दुग्ध संघ, मार्केटिंग/उपभोक्ता फेडरेशन)। रिपोर्ट के तीन आम कारण होते हैं:
उदाहरण: एक दुग्ध सहकारी समिति अपने ज़िला दुग्ध संघ को रोज़/मासिक दूध-संग्रह व भुगतान का ब्योरा देती है; संघ इसी से भुगतान-चक्र, अनुदान व योजना तय करता है। यहाँ भी नियम वही है — आँकड़ा खातों से सीधे आए, अलग रजिस्टर से नहीं।
⚠️ हर फेडरेशन के प्रपत्र, आवृत्ति (रोज़/मासिक/तिमाही) व तिथियाँ अलग होती हैं — अपने संघ से मौजूदा फ़ॉर्मैट पक्का करें।
ये सब रिपोर्ट आपके रोज़ के सही हिसाब से ही बनती हैं:
क्या NABARD रिटर्न हर सहकारी समिति को देना होता है? — नहीं; NABARD मुख्यतः सहकारी बैंकों (StCB/DCCB) व RRB का पर्यवेक्षण करता है। PACS व सामान्य समितियाँ अपने राज्य के रजिस्ट्रार (RCS) को रिपोर्ट/ऑडिट देती हैं। खाता NPA कब बनता है? — RBI के IRAC मानदंड अनुसार, जब ब्याज या मूलधन 90 दिन से अधिक बकाया रहे। उसके बाद उस पर आय केवल वसूली के आधार पर दर्ज होती है। वसूली% कैसे निकालें? — (वसूल राशि ÷ देय राशि) × 100। जैसे ₹10 लाख देय में से ₹8.5 लाख वसूल = 85%। समिति का ऑडिट कौन करता है और कब तक? — रजिस्ट्रार के पैनल का अंकेक्षक; समय-सीमा राज्य के अधिनियम अनुसार (उदाहरण: महाराष्ट्र में वर्ष-समाप्ति से 4 माह के भीतर)। PACS कंप्यूटरीकरण से रिपोर्टिंग पर क्या असर? — CAS+MIS के कारण आँकड़े खातों से सीधे बनते हैं, इसलिए रिपोर्ट तेज़, मानक व कम-ग़लती वाली होती है। PACS सीधे NABARD को रिपोर्ट करती है या DCCB को? — व्यवहार में PACS अपना लेखा DCCB को देती है और वैधानिक ऑडिट रजिस्ट्रार को; DCCB फिर NABARD को OSS रिटर्न भेजता है।
NABARD/फेडरेशन रिपोर्टिंग बोझ नहीं, बल्कि सही हिसाब का स्वाभाविक नतीजा है। पहले यह साफ़ रखें कि आप किसे रिपोर्ट करते हैं — बैंक हैं तो NABARD/RBI, समिति हैं तो रजिस्ट्रार — फिर साफ़ खाते रखें, NPA व वसूली पर साल भर नज़र रखें, और रिपोर्ट अपने-आप तैयार।
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